मुहम्मद शाह शासनकाल

इन के शासनकाल में 1739 ने नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर दिल्ली में भयानक लूट फैलाई और दिल्ली में कोहिनूर हीरा समेत तखत ऐ ताऊज इसको लूटकर वापस आ गया मोहम्मद शाह रंगीला बहुत ही कमजोर शासक के रूप में ऊभरा कई सारे विदेशी आक्रमण हुए बाजीराव में1737 में दिल्ली के युद्ध में मुगल सेना को दिल्ली में पराजित कर दक्षिण भारत लौट गया लौटते वक्त निजाम और मुगलों की सेना का भोपाल में उसका सामना किया पर बाजीराव प्रथम ने भोपाल में निजाम और मुगलों की सेनाओं को पराजित कर भोपाल की संधि उसके मालवा क्षेत्र उसको प्राप्त हो गया है मुगलो का अंत शुरू होगया और विदेशी शक्तियां भारत में वापस आने लगी।
नसीरुद्दीन मुहम्मद शाह (जन्म का नाम रोशन अख़्तर) (7 अगस्त 1702 – 6 अप्रैल 1748) 1719 से 1748 तक मुग़ल बादशाह थे। इन्हें मोहम्मद शाह रंगीला के नाम से भी जाना जाता है यह बड़े ही रंगीन तबके के थे इन्हें नाच गाने का बड़ा शौक था उस वक्त कई विदेशी शक्तियों की नजर मुगल सल्तनत पर पड़ी थी क्योंकि उस वक्त मुगल काफी कमजोर थे पिछले कई वर्षों में कई सारे सम्राटों के गद्दी पर बैठने के कारण मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ गया था जिसके कारण कई विदेशी शक्तियां भारत पर अपने पांव पसार रही थी।इन का राज्याभिषेक 1719 इसी में सैयद बंधुओं की सहायता से हुआ उन्होंने मोहम्मद शाह को सुल्तान बनाने की कोशिश की परंतु मोहम्मद शाह को सैयद बंधु से काफी खतरा पैदा हो गया था क्योंकि उन्होंने पहले भी कई सारे मुगल सम्राटों का कत्ल करवाया था। जिसके कारण उन्होंने सर्वप्रथम आसफ जा प्रथम जो कि आगे चलके हैदराबाद के निजाम बने उनकी सहायता से सैयद बंधुओं को खत्म करवा दिया। 1722 ईस्वी में और एक स्वतंत्र मुगल सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित हुये हालांकि उनके जीवन की एकमात्र सफलता रही। उसके बाद उनके जीवन में लगातार हार का सिलसिला शुरू हो गया। 1724 में निजाम उल मुल्क ने मुगल सम्राट मोहम्मद शाह के खिलाफ कार्रवाई की जिसमें उन्होंने ढक्कन से अवध न आने का फैसला किया था परंतु मोहम्मद शाह ने उनसे कहा कि वह ढक्कन की सुबेदार छोड़कर अवध के सूबेदार बन जाए परंतु निजामुलमुलक ने इस बात को नकार दिया और अपनी सेनाओं को लेकर मुगल सम्राट की सेना को 1726 में पराजित कर दिया जिसमें मराठों ने भी निजाम की मदद की थी। 1736 में बाजीराव पेशवा की सेनाओं ने दिल्ली की ओर कूच किया हमारे आगरा पहुंचे मोहम्मद शाह ने शहादत अलीखान प्रथम जोकि अवध के नवाब थे उनसे कहा कि वह बाजीराव प्रथम को दिल्ली आने से पहले ही रोक ले परंतु उन्होंने शहादत अली खान को धोखा देकर दिल्ली की ओर बाजीराव निकल गया और शादतअली खान आगरा में अपनी एक लाख की सेना लेकर इंतजार करते रहे बाजीराव प्रथम दिल्ली पहुंच गए और वहां पहुंचकर काफी लूट मचाई मोहम्मद शाह ने बाजीराव की सेना को देखकर लाल किले में छुप गए बाजीराव प्रथम ने दिल्ली को लूट कर वापस लोट गये।इस बात को लेकर मोहम्मद जाने निजाम उल मुल्क की दक्कन के सूबेदार थे उनको पत्र लिखा और बाजीराव को पुणे से पहले ही रोकने के लिए कहा निजाम उल मुल्क जो कि 1728 में बाजीराव प्रथम द्वारा हराया जा चुका था। बाजीराव से बदला लेना चाहता था जिसने भोपाल के निकट बाजीराव की सेनाओं को घेर लिया जिसने बाजीराव ने निजाम और मुगल सेनाओं को पराजित किया और भोपाल की संधि 1738 जिसमें उन्हें मालवा क्षेत्र प्राप्त हुआ संपूर्ण मालवा क्षेत्र बाजीराव प्रथम को प्राप्त हो चुका था और उसके लिए बहुत बड़ी सफलता थी और मुगल कमजोर हो गये। 1739 में नादिरशाह ने ईरान से भारत की ओर रुख किया और हिंदू कुश के पहाड़ को पार करते हुए पेशावर के सूबेदार को पराजित कर 1739 में भारत में दाखिल हो गया उसने करनाल पहुंचकर मुगल सम्राट मोहम्मद शाह की सेनाओं को जो कि करीब 100000 से भी अधिक की थी उसको पराजित किया और मुगल सम्राट को लेकर दिल्ली की ओर चल दिया उसने मोर्चा को कैद कर लिया और दिल्ली के जाकर खुद को सुल्तान घोषित कर दिया दिल्ली में उसके नाम को खुदबा पढ़ा गया परंतु बाद में उस पर दिल्ली में घुसते हुये उसके सीने पर गोली चलाई गई। नादिरशाह इस बात से नाखुश हो गया और उसने सभी सैनिकों को दिल्ली में लूटपाट मचाने का आदेश दे दिया दिल्ली में भयानक लूट मचाई गई 40000 से भी ज्यादा लोगों का कत्ल करवाया गया और अरबों का खजाना लाल किले से लूटकर ले जाया गया जिसमें कोहिनूर और तख़्त ताउज भी शामिल था ये हार उसके लिए बहुत बड़ी थी जिसे मुगल सम्राट की ताकत बिल्कुल शक्तिहीन हो गई और भारत में विदेशी शक्तियों का बोलबाला हो गया।यह उसके कम नेतृत्व क्षमता और अदूरदर्शिता को दर्शाता था और उसका मन नाच गाने और शायरी में ज्यादा लगता था इसके कारण ही मुगल साम्राज्य का पतन होना शुरू हो गया अंतर 1748 ईस्वी में जो हो 46 वर्ष का था उसका निधन हो गया उसका निधन बहुत बुरी तरीके से हुआ निजाम उल मुल्क जिस पर उसका बहुत भरोसा था उसकी युद् मे मोत हो जाने के कारण वह अकेले कमरे में बैठकर चिल्लाया करता थे। और उसका दुख उसे सहन नहीं हुआ और अंत में 1748 में उसकी मौत हो गई उसके बाद उसके पुत्र अहमद शाह बहादुर मुगल सम्राट बने।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Don`t copy text!