अंतरराष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन

अंतरराष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय
अंतरराष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय के लिए नियम द्वारा प्रदान किया गया था, लेकिन इसके द्वारा स्थापित नहीं किया गया। परिषद और सभा ने अपने संविधान की स्थापना की। इसके न्यायाधीश परिषद और सभा द्वारा चुने गए थे और इसका बजट सभा द्वारा प्रदान किया जाता था। न्यायालय की संरचना में ग्यारह न्यायाधीशों और चार उप-न्यायाधीशों को नौ साल के लिए निर्वाचित किया गया था। संबंधित पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए गए किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद को सुनने और फैसला करने में न्यायालय सक्षम रहा था। परिषद या सभा की ओर से भेजे गए किसी भी विवाद या प्रश्न पर यह अपना परामर्शी मत दे सकता था। कोर्ट कुछ व्यापक परिस्थितियों में दुनिया के सभी देशों के लिए खुला था। तथ्य संबंधी प्रश्नों के साथ ही कानून के प्रश्न भी प्रस्तुत किये जा सकते थे।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ (ILO)) का गठन 1919 में वरसाई संधि के भाग तेरह के आधार पर किया गया था और यह संघ के संचालन का हिस्सा बन गया।
आईएलओ में हालांकि वही सदस्य थे जो संघ में थे और सभा के बजट नियंत्रण के अधीन यह अपने ही शासकीय निकाय, अपने स्वयं के आम सम्मेलन और अपने स्वयं के सचिवालय के साथ एक स्वायत्त संगठन था। इसका संविधान संघ से अलग था, इसमें न केवल सरकारों को बल्कि कर्मचारी एवं श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व दिया गया था।
इसके पहले निदेशक अल्बर्ट थॉमस थे। आईएलओ ने पेंट में सीसा मिलाए जाने को सफलतापूर्वक प्रतिबंधित किया था और अनेक देशों को आठ घंटे का कार्य दिवस और अड़तालीस घंये का सार्य सप्ताह अपनाने के लिए कायल किया था। इसने बालश्रम खत्म करने, कार्यस्थलों पर महिलाओं के अधिकारों में वृद्धि करने तथा जहाजकर्मियों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं के लिए जहाज मालिकों को जिम्मेदार ठहराने के काम भी किए। संगठन 1946 में संयुक्त राष्ट्र संघ की एक एजेंसी बन कर संघ के समाप्त होने के बाद भी अस्तित्व में बना रहा।
स्वास्थ्य संगठन
संघ के स्वास्थ्य संगठन के तीन निकाय थे, संघ के स्थाई अधिकारियों से युक्त एक स्वास्थ्य ब्यूरो, एक चिकित्सा विशेषज्ञों से युक्त कार्यकारी खंड आम सलाहकार परिषद या सम्मेलन और एक स्वास्थ्य समिति. समिति का उद्देश्य जांच आयोजित करना, संघ के स्वास्थ्य कार्यों के संचालन की निगरानी करना और परिषद में प्रस्तुत करने के लिए काम तैयार करवाना था। इस निकाय ने कुष्ठ रोग, मलेरिया तथा पीले बुखार को, बाद वाले दोनों के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय मच्छर उन्मूलन अभियान शपरू करके, समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया। स्वास्थ्य संगठन ने संघ सोवियत सरकार के साथ भी सन्निपात की महामारी को रोकने के लिए बीमारी के बारे में बड़ा शिक्षा अभियान आयोजित करके सफलतापूर्वक काम किया था।
बौद्धिक सहयोग पर समिति
राष्ट्र संघ ने अपने निर्माण के बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग के सवाल पर गंभीरता से ध्यान समर्पित किया था। पहली सभा (1920 दिसम्बर) ने सिफारिश की थी कि परिषद बौद्धिक कार्य के अंतरराष्ट्रीय संगठन को लक्ष्य करके कार्रवाई करे. परिषद ने द्वितीय सभा की पांचवीं समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को अपनाया और अगस्त 1922 में जिनेवा में बौद्धिक सहयोग पर एक प्रतिष्ठित समिति को आमंत्रित किया।
समिति के काम के कार्यक्रम में शामिल थे: बौद्धिक जीवन की स्थितियों में जांच, जिन देशों का बौद्धिक जीवन खतरे में था उनको सहायता, बौद्धिक सहयोग के लिए राष्ट्रीय समितियों का गठन, अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक संगठनों के साथ सहयोग, बौद्धिक संपदा की रक्षा, अंतर – विश्वविद्यालय सहयोग, के संरक्षण के साथ सहयोग के लिए राष्ट्रीय समितियों के निर्माण के लिए सहायता, ग्रन्थसूची के काम और प्रकाशनों के अंतरराष्ट्रीय विनिमय का समन्वय, पुरातात्विक अनुसंधान के क्षेत्र में और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग.
स्थायी केन्द्रीय अफीम बोर्ड
संघ औषधि व्यापार को विनियमित करना चाहता था और उसने अफीम तथा इसके उप-उत्पादों के उत्पादन, निर्माण, व्यापार और खुदरा में मध्यस्थता करने वाले दूसरे अंतर्राष्ट्रीय अफीम सम्मेलन द्वारा शुरू की गई सांख्यिकीय नियंत्रण प्रणाली की निगरानी करने के लिए स्थाई केंद्रीय अफीम बोर्ड की स्थापना की। बोर्ड ने नशीली दवाओं के वैध अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए आयात प्रमाणपत्र तथा निर्यात प्राधिकरण की प्रणाली स्थापित की।
दासता आयोग
दास आयोग ने दुनिया भर में गुलामी और गुलाम व्यापार के उन्मूलन की मांग की और मजबूरन वेश्यावृत्ति के विरूद्ध संघर्ष किया। इसकी मुख्य सफलता वैधानिक राष्ट्रों में सरकारों द्वारा उन देशों में गुलामी समाप्त करने के लिए दबाव डाला जाना था। संघ ने सन 1926 में सदस्यता की एक शर्त के रूप में इथियोपिया से एक प्रतिबद्धता प्राप्त कि की वह गुलामी को समाप्त करेगा और लाइबेरिया के साथ जबरन श्रम और अंतर-आदिवासी गुलामी को समाप्त करने के लिए कार्य किया।
यह सिएरा लियोन में 200,000 दासो को मुक्त करने में सफल हुआ और अफ्रीका में बेगार की प्रथा रोकने के प्रयास में दास व्यापारियों के खिलाफ संगठित छापे डाले। यह तंगान्यिका रेलवे निर्माण में कार्यरत श्रमिकों की मृत्यु दर को 55% से 4% तक कम करने में सफल रहा। गुलामी, वेश्यावृत्ति और महिलाओं और बच्चों की तस्करी पर नियंत्रण रखने के लिए रिकॉर्ड बना कर रखा गया।

शरणार्थी आयोग
फ्रिद्त्जोफ़ नानसें के नेतृत्व में शरणार्थियों के लिए आयोग उनकी स्वदेश वापसी की देखरेख सहित शरणार्थियों के हितों की देखरेख और, जब आवश्यक हो पुनर्वास की व्यवस्था करता था। प्रथम विश्व युद्ध के अंत में रूस भर में बीस से तीस लाख पूर्व युद्ध बंदी फैले हुए थे, आयोग की स्थापना के दो वर्षों के भीतर, सन 1920 तक, इसने 425,000 लोगों को उनके घर लौटने में मदद की थी। इसने 1922 में तुर्की में शरणार्थी संकट से निपटने के लिए शिविरों की स्थापना की, के साथ बीमारी और भूख को रोकने में देश की सहायता की। इसने नानसें पासपोर्ट स्थापित किया जो शरणार्थियों के लिए पहचान का साधन था।
महिलाओं की कानूनी स्थिति के अध्ययन के लिए समिति
महिलाओं की कानूनी स्थिति के अध्ययन के लिए गठित समिति ने पूरी दुनिया में महिलाओं की स्थिति की जांच करने की मांग की। यह अप्रैल 1938 में बनाई गई थी और 1939 के शुरू में भंग कर दी गई। समिति के सदस्यों में शामिल थे- ममे. पी. बस्तिद (फ्रांस), एम डी रुएल्ले (बेल्जियम) ममे. अंका गोद्जेवाक (यूगोस्लाविया), श्री एच.सी. गुत्रिज (ग्रेट ब्रिटेन) मल्ले. कर्स्टन हेस्सेल्ग्रें (स्वीडन), सुश्री डोरोथी केन्योन (संयुक्त राज्य अमेरिका), एम. पॉल सेबस्त्यें (हंगरी) और सचिवालय श्री ह्यूग मैक् कीनन वुड़ (ग्रेट ब्रिटेन)।

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