पादप वर्गीकरण, आइए जाने

पादप वर्गिकी (Plant Taxonomy) के अन्तर्गत पृथ्वी पर मिलने वाले पौधों की पहचान तथा पारस्परिक समानताओं व असमानताओं के आधार पर उनका वर्गीकरण किया जाता है। विश्व में अब तक विभिन्न प्रकार के पौधों की लगभग 4.0 लाख जातियाँ ज्ञात है जिनमें से लगभग 70% जातियाँ पुष्पीय पौधों की है। प्राचीनकाल में मनुष्य द्वारा पौधों का वर्गीकरण उनकी उपयोगिता जैसे भोजन के रूप में, रेशे प्रदान करने वाले, औषधि प्रदान करने वाले आदि के आधार पर किया गया था लेकिन बाद में पौधों को उनके आकारिकीय लक्षणों (morphological characters) जैसे पादप स्वभाव, बीजपत्रों की संख्या, पुष्पीय भागों की संरचना आदि के आधार पर किया जाने लगा। वर्तमान में पौधों के आकारिकीय लक्षणों के साथ-साथ भौगोलिक वितरण, शारीरिक लक्षणों (Anatomical characters), रासायनिक संगठन, आण्विक लक्षणों (molecular characters) आदि को भी वर्गिकी में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रकार पादप वर्गिकी के उपयुक्त आधारों के अनुसार निम्न प्रकार के बिन्दु स्पष्ट हो जाते है –
(1) कोशिका वर्गिकी (Cytotaxonomy) : कोशिकीय संरचना व संगठन के आधार पर
(2) रसायन वर्गिकी (Chemotaxonomy) : रासायनिक संगठन के आधार पर
(3) आण्विक वर्गिकी (molecular taxonomy) : आनुवांशिक पदार्थ के आधार पर
वर्गिकी शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रेन्च वनस्पति शास्त्री ए. पी. डी. केण्डोले (A.P.De. Candolle) ने 1834 में अपनी पुस्तक “Theories elementaire de la botanique” (Theory of Elementary Botany) में किया तथा इसमें वर्गीकरण के सामान्य सिद्धान्तों के अध्ययन के बारे में बताया तथा पादप वर्गिकी को इस प्रकार परिभाषित किया- :“पादप वर्गिकी वनस्पति विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत पौधों की पहचान, नामकरण एवं वर्गीकरण के बारे में अध्ययन किया जाता है।
बाद में कैरोलस लिनीयस (Carolus Linnaeus) ने अपनी पुस्तक ‘सिस्टेमा नेचुरी’ (Systema Naturae) में वर्गीकरणीय विज्ञान (Systematics) शब्द का प्रयोग किया जो ग्रीक भाषा के शब्द Systema से लिया गया है जिसका अर्थ समूहबद्ध करना या साथ-साथ रखना है।
अत: स्पष्ट है कि वर्गिकी के अन्तर्गत निम्न कार्य प्रमुखतः सम्पन्न किये जाते है –
(1) जाति को पहचान कर उसका पूरा विवरण प्रस्तुत करना अर्थात् आधारभूत वर्गिकी इकाई (Basic taxonomic unit) को पहचानना।
(2) सजीवों की समानताओं एवं पारस्परिक सम्बन्धों के आधार पर इन आधारभूत इकाईयों का समूहबद्द करने के तरीकों का विकास करना।

वर्गिकी के सिद्धान्त

अमेरिकन वर्गिकीविज्ञ (Taxonomist) एडवर्ड चार्ल्स बेसी (Edward Charles Bessey) ने आवृतबीजियों की जातिवृत्तीय (Phylogenetic) वर्गिकी (Taxonomy) में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। पौधों में कौन सी स्थिति प्रगत (Advanced) तथा कौन सी आद्य (Primitive) है इसके निर्धारण के लिये विभिन्न वर्गिकीविज्ञों (बेसी हचिन्सन आदि) द्वारा कुछ महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है जिसके प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित है –

  1. विकास का क्रम ऊपरी (upwards) तथा नीचे की ओर (downwards) दोनों दिशाओं में होता है।
  2. एक ही समय में पौधे के सभी अंगों में विकास समान गति से नहीं होता है।
  3. किसी एक कुल या वंश में वृक्ष एवं क्षुप (trees and shrubs) पौधे शाकीय (herbaceous) एवं आरोही (Climbers) पौधों से अधिक आदिम (Primitive) है।
  4. बहु वर्षी (Perennials) पादप, वार्षिक (annuals) पादपों से आद्य (primitive) है।
  5. स्थलीय पादपों (terrestrial plants) से जलीय पादप (aquatic plants) विकसित हुए हैं तथा अधिपादप (epiphytes), मृतोपजीवी (saprophytes) और परजीवी (parasitic) पादप सबसे प्रगत (Advance) है।
  6. द्विबीजपत्री पादप (dicotyledons) एकबीजपत्री पादपों (monocotyledons) से आद्य (primitive) है।
  7. सरल व आशाखित तना (की प्रवृति) आद्य (primitive) तथा शाखित तना प्रगत है।
  8. पर्ण का पर्व संधियों पर एकल एवं सर्पिलाकार व्यवस्थित होना (spiral arrangement), सम्मुख (opposite) व चक्रिक (cyclic) रूप से व्यवस्थित होने से अधिक आद्य (primitive) है।
  9. सरल पर्ण (Simple leaves) आद्य (primitive) तथा संयुस्त पर्ण (compound leaves) प्रगत है।
  10. चरलग्न पर्ण (persistent leaves) आद्य तथा पर्णपाती (decicuous) पर्ण प्रगत (advanced) है।
  11. बहुतयी (Polymerous) पुष्प आद्य (primitive) है तथा अल्पतयी (oligomerous) पुष्प प्रगत (advanced) है।
  12. द्विलिंगी पुष्प आद्य तथा एकलिंगी प्रगत है।
  13. उभयलिंगाश्रयी (Monoecious) पादप आद्य तथा एकलिगाश्रयी (dioecious) पादप प्रगत है।
  14. एकल पुष्प (solitary flowers) आद्य तथा पुष्पक्रम में (विन्यास) प्रगत है।
  15. दलयुस्त पुष्प (flowers with petals) आद्य तथा दलविहीन (apetalous) या नक्ष्न पुष्प प्रगत है।
  16. पृथकदलीय पुष्प (polypetalous flowers) आद्य तथा संयुस्त दलीय (gamopetalous) प्रगत है।
  17. दल विन्यास के विकास का क्रम इस प्रकार है :
    व्यावर्तित (Twisted), कोरछादी (Imbricate), कोरस्पर्शी (Valvate)
  18. त्रिज्यासममित (actinomorphic) पुष्प आद्य तथा एकव्यास सममित (zygomorphic) पुष्प प्रगत है।
  19. जायांगधर (hypogynous) पुष्प आद्य तथा जायांगोपरिक (epigynous) पुष्प सबसे प्रगत दशा है।
  20. बहुअण्डपता (polycarpy) आद्य तथा अल्पअण्डपता (oligocarpy) प्रगत दशा है।
  21. वियुस्ताण्डपता (apocarpous) आद्य तथा संयुस्ताण्डपता (syncarpous) प्रगत दशा है।
  22. भ्रूणपोषी (endospermic) बीज आद्य एवं अभ्रूणपोषी (nonendospermic) बीज प्रगत है।
  23. अधिक पुंकेसरों युस्त पुष्प आद्य तथा कम पुंकेसरों वाले प्रगत है।
  24. पृथक पुंकेसरी (polystaminous) पुष्प आद्य तथा संयुस्त पुंकेसरी (synstaminous) पुष्प प्रगत है।
    डेविस (Davis, 1967) ने इनमें कुछ और लक्षणों को सम्मिलित किया है, जो इस प्रकार है :
  25. अननुपर्णी (exstipulate) पत्तियों की अपेक्षा अनुपर्णी (Stipulate) अधिक आद्य है तथा स्वतंत्र अनुपर्ण (Free stipules) सलां ग अनुपर्ण की अपेक्षा आद्य है।
  26. द्विबीजपत्री पौधों में फायलोडिक (phyllodic) पर्ण, पटलीय पर्ण की अपेक्षा प्रगत है।
  27. तने, शाखाओं, पत्तियों एवं सहपत्रों का कंटीलापन या व्युत्पन्न (derived) अधिक आधु निक स्थिति है जो वातावरण के अनुकू लन के रूप में विकसित हुई है।
  28. प्रकीर्णन एवं वितरण की आद्य इकाई बीज है, लेकिन आगे चलकर चरम स्थिति में पुष्पक्रम अथवा टम्बल वीɬस (लुढकने वाले पौधों) में पूरा पौधा ही प्रकीर्णन की इकाई बन जाता है।
  29. पुष्प एवं पुष्पांगों की बहु रूपीयता, एकरूपीयता से विकसित है।
    कई एन्जियोस्पर्म्स कुलों में प्रगत एवं आद्य लक्षण दोनों ही पाये जाते है। लेबियेटी कुल में पुष्य का जायांगधर लक्षण आद्य है जबकि अन्य सभी लक्षण प्रगत माने जाते है। इसके पुष्पों में पृथक परिदल (perianth) एक आद्य लक्षण है। एक ही कुल में ऐसे आद्य एवं प्रगत लक्षणों की उपस्थिति उनकी स्थिति के बारे में कठिनाई प्रदर्शित करती है।

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