रोपण यंत्र

19वीं शती में अमरीका और यूरोप में रोपणयंत्रों का विकास हुआ। ऐसे वपित्र (seeders) भारत में भी देखे जाते हैं। इन वपित्रों के सिद्धांत पर, बैलों से चलनेवाले कुछ वपित्र भी बने हैं। ऐसे यंत्र, या तो बीज बोनेवाले होते हैं, या पौधों की कतार में, कुछ दूरी पर, बोनेवाले होते है।
ऐसे यंत्रों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है : (1) बीज छींटनेवाले यंत्र और (2) छोटे छोटे पौधों को लगानेवाले यंत्र। बीज छींटनेवाले यंत्र हाथ से चलनेवाले, या एक पहिएवाले ठेले पर चलनेवाले होते हैं। बीज छींटनेवाले यंत्र अनेक प्रकार के बने हैं, जिनमें निम्नलिखित अधिक महत्व के हैं :
1. झोलेदार छिट्टा वपित्र (Knapsack Broadcasting Seeder)
2. अंतद्वार वपित्र (Endgate seeder)
3. द्विचक्री छिट्टा वपित्र (Two-wheel Broodcaster)
4. एकचक्री बैरो छिट्टा वपित्र (Wheel Barrow Broadcaster)
झोलेदार छिट्टा वपित्र में एक बड़े थैले के नीचे एक तख्ता और अन्य पुर्जे लगे रहते हैं। पेटी द्वारा पूरी मशीन को आदमी अपने कंधे पर लटकाए रखता है। एक हाथ से चलाया जानेवाला क्रैक, या गियर, घुमाते हैं और बीज का वितरण एक तश्तरी द्वारा होता है। तश्तरी में ऊँचे किनारे से बने रहते हैं जो बीज को आगे की तरफ फेंकते हैं। बीज की मात्रा आगे पीछे चलनेवाले एक छोटे से रेखाछिद्र (slit) से नियंत्रित होती है। जितना ही चौड़ा यह रेखाछिद्र खोला जाएगा उतना ही अधिक बीज गिरेगा। इस प्रकार के वपित्र घास बोने के काम में आते हैं।
अंतद्वार वपित्र में एक युक्ति (device) जोड़ी जाती है, जो एक गाड़ी में संदूक के पीछे रख दी जाती है। इस मशीन में बीज रखने का एक डिब्बा, बीज लेने का यंत्र और एक या दो बीज बाटनेवाले पहिए होते हैं। इसका किनारा उठा हुआ रहता है। अरीय (radial) पहिए एक गियर और चेन द्वारा चलते हैं और पहियों को चलाने की शक्ति उस गाड़ी के पहिए से ली जाती है जिसपर मशीन रखी जाती है। द्विचक्री छिट्टा वपित्र घोड़ों से चलाया जाता है। ऐसी मशीनें दो प्रकार की, एक चौड़ी लीकवाली और दूसरी कम चौड़ी लीक वाली, होती हैं। कम चौड़ी लीकवाली अधिक उपयोगी समझी जाती है। एकचक्री बैरो छिट्टा वपित्र, पहिएवाले ढेले के फ्रेम पर बीज का लंबा संदूक रखकर, बनाया जाता है। यह संदूक 2 वर्ग इंच चौड़ा और 8 से 16 इंच तक लंबा होता है।

बीज वपित्र (Seed Drills)

बीज वपित्रों में इधर बड़ी प्रगति हुई है। सर्वाधिक महत्व का सुधार लोहे के संदूक का उसपर बैठाने में है। इससे इन संदूकों की मजबूती और टिकाऊपन ही नहीं बढ़ गया है, वरन्‌ बीज भरने की मात्रा भी बहुत बढ़ गई है। बीज वपित्र कई प्रकार के बने हैं। कुछ एक टिकलीवाले और कुछ दो टिकनीवाले बने हैं। एक टिकलीवाले दो टिकलीवाले से अच्छा काम करते हैं। बड़े कृषिक्षेत्र वाले किसान बड़ी मशीन और छोटे कृषिक्षेत्रवाले किसान छोटी मशीन अधिक उपयोगी समझते हैं। वपित्र आम तौर से ट्रैक्टर के पीछे लगाकर चलाए जाते हैं। बहुत बड़े वपित्र एक बार में 20 से 25 पंक्तियाँ एक साथ बोते हैं। अधिकतर वपित्र तीन प्रकार के होते हैं :
1. कटोरीभरण और नालीदार पहिएवाले वपित्र (Cupfeedtype Fluted Roller)
2. दोहरी चाल के नालीदार पहिएवाले, या दो तवेवाले वपित्र (Double-run Fluted Roller)
3. आंतर दोहरी चालवाले वपित्र (Internal Doublerun Force Feed Type)
कृषिक्षेत्र में अधिकतर दोहरी चाल के नालीदार पहिएवाले वपित्र ही प्रयोग में आते हैं। कटोरीभरण और नालीदार पहिएवाले वपित्र का उपयोग कुछ दिनों तक ब्रिटेन में हुआ था, पर बड़े बड़े कृषिक्षेत्रों में यह सफल न हो सका।

कटोरीभरण क्रिया विधि

बीज का संदूक दो भागों में बँटा रहता है। ऊपर के हिस्से में बीज रखा जाता है और नीचे का भाग भरण संदूक कहलाता है। ये दोनों भाग एक कपाट (shutter) द्वारा मिले रहते हैं। ऊपर के हिस्से में बीज रखा जाता है और कपाट द्वारा दूसरे भाग में ऐसे जाता है कि बीज अधिक मात्रा में न आकर ठीक मात्रा में आए। दाना बाँटनेवाले हिस्से को कई छोटी छोटी कोठरियों में बाँट दिया जाता है, जिनमें बीज बाँटनेवाली क्रियाविधि चालू रहती है। इन पुर्जों की बनावट बहुत ही साधारण होती है। एक टिकली पर, जो एक शाफ्ट पर घूमती रहती है छोटे छोटे चम्मच लगे रहते हैं और ये चम्मच कुछ दाने उठाकर हॉपर (धानकीप) के मुँह में जो एक नली द्वारा उस बीज को फोल्टर तक पहुँचा देता है डालते रहते हैं और इस प्रकार बीज कुंड में गिर जाता है।

दोहरी चाल के नालीदार पहिएवाले, या दो तवेवाले वपित्र

दोहरी चाल के नालीदार पहिएवाले वपित्र का निर्माण संयुक्त राज्य, अमरीका, में हुआ और यह अधिकतर दानेवाली फसलों के बोने के काम आता है, पर यह कटोरीवाले नालीदार वपित्र के बराबर सफल नहीं है। इस वपित्र के अंदर बीज गिरानेवाली हर एक टिकली, जिसके दोनों तरफ खाँचे होते हैं, एक शैफ्ट पर बीजवाले संदूक के नीचे की ओर वपित्र के अंदर पहियों के घूमने पर घूमा करती है और बीजवाले संदूक से बीज उठाकर एक नली के द्वारा कूँड़े में पहुँचा देती है।
कटोरीवाले नालीदार वपित्र में एक गोल लट्ठे पर नालियाँ सी कटी रहती हैं और यह एक शैफ्ट पर एक छोटे से डिब्बे में घूमता है, जो बीजवाले संदूक से बीज लेकर नली द्वारा कूंड़ में गिराता है। यह ऐसा बना होता है कि बीज की मात्रा कम और अधिक की जा सके। ऐसे वपित्र कृषिक्षेत्रों में बहुत उपयोगी हैं। ये छोटे बड़े सभी प्रकार के बनते हैं। बैलों, या घोड़ों से चलनेवाले से लेकर बड़ी बड़ी मशीनों से चलनेवाले वपित्र तक हैं, जिनसे एक बार में 25 कतारें तक बोई जा सकती हैं और यह कटोरी वाला नालीदार वपित्र ट्रैक्टर के पीछे चलता है।
कूंड़ा बनाने की मशीनें, कूंड़कारी (furrow opener), भी बनी है। कूंड़कारी मशीनें कुछ एक टिकलीवाली, कुछ दो टिकलीवाली और कुछ ‘हो’ किस्म की होती है।

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