उत्प्रेरण के सिद्धांत

यद्यपि उत्प्रेरण को समझने समझाने के लिए बहुत पहले से अध्ययन होते चले आ रहे हैं, तथापि इस विषय में अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है। वैज्ञानिक इसपर एकमत हैं कि सभी उत्प्रेरक एक ही सिद्धांत के अनुसार क्रिया नहीं करते। उत्प्रेरण की व्यवस्था के लिए दो सिद्धांत काम में लाए जाते हैं- (1) मध्यवर्ती यौगिक सिद्धांत; (2) अधिशोषण सिद्धांत।
1. मध्यवर्ती यौगिक सिद्धांत- यह उत्प्रेरण की व्याख्या के लिए एक रासायनिक सिद्धांत है। इसके अनुसार उत्प्रेरक पहले प्रतिकर्मकों में से एक के साथ क्रिया करके एक मध्यवर्ती अस्थायी यौगिक बनाता है; फिर वह मध्यवर्ती अस्थायी यौगिक दूसरे प्रतिकर्मकों से क्रिया करके प्रतिफल देता है तथा उत्प्रेरक पुन: अपनी पूर्वावस्था में आ जाता है। इसके अनुसार प्रतिकर्मकों “क” तथा “ख” की संयोजनक्रिया उत्प्रेरक “ग” की उपस्थिति में निम्नलिखित प्रकार से प्रकट की जाती है:
क + ग = क ग (अस्थायी मध्यवर्ती यौगिक);
क ग + ख = क ख + ग;
क + ग = क ग
क्रिया के अंत तक यही क्रम चलता रहता है।
मध्यवर्ती यौगिक सिद्धांत के द्वारा कुछ क्रियाओं के उत्प्रेरण की व्याख्या सरल है। परंतु अधिकांश विषमावयवी क्रियाओं तथा उत्प्रेरक वर्धकों अथवा विषों की क्रियाओं को समझाना कठिन या असंभव सा है।
2. अधिशोषण सिद्धांत- यह उत्प्रेरण की व्याख्या के लिए भौतिक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार प्रतिकर्मक उत्प्रेरक के तल पर घनीभूत हो जाते हैं। इस प्रकार उत्प्रेरक तल पर प्रतिकर्मकों की सांद्रता बढ़ जाने से मात्रा-अनुपाती-नियम के अनुसार क्रिया का वेग बढ़ जाता है।
अब उपर्युक्त दोनों सिद्धांतों को मिलाकर एक नया सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। इसके अनुसार उत्प्रेरक पदार्थ के तल पर कुछ सक्रिय केंद्र होते हैं। इन केंद्रों में अणुओं या परमाणुओं को अधिशोषित करने की क्षमता होती है। अत: धातु के तल पर प्रतिकर्मकों के घनी भूत होने से साद्रंता तो बढ़ती ही है, जिसके कारण क्रियावेग में वृद्धि होती है, साथ ही इन सक्रिय केंद्रों पर प्रतिकर्मक इनके साथ अस्थायी यौगिक भी बना लेते हैं, जो मध्यवर्ती यौगिक सिद्धांत के अनुसार उत्प्रेरण का कार्य करते हैं।

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