पृथ्वीराज चौहान की शासन व्यवस्था

पृथ्वीराज चौहान चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे, जो उत्तर भारत में 12 वीं सदी के उत्तरार्ध में अजमेर (अजयमेरु ) और दिल्ली पर राज्य करते थे। वे भारतेश्वर, पृथ्वीराजतृतीय, हिन्दूसम्राट्, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा इत्यादि नाम से प्रसिद्ध हैं। भारत के अन्तिम हिन्दूराजा के रूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज 1235 विक्रम संवत्सर में पंद्रह वर्ष (15) की आयु में राज्य सिंहासन पर आरूढ़ हुए। पृथ्वीराज की तेरह रानियाँ थी। उन में से संयोगिता प्रसिद्धतम मानी जाती है। पृथ्वीराज ने दिग्विजय अभियान में 1177 वर्ष में भादानक देशीय को, 1182 वर्ष में जेजाकभुक्ति शासक को और 1183 वर्ष में चालुक्य वंशीय शासक को पराजित किया। इन्हीं वर्षों में भारत के उत्तरभाग में घोरी (ग़ोरी) नामक गोमांस भक्षण करने वाला योद्धा अपने शासन और धर्म के विस्तार की कामना से अनेक जनपदों को छल से या बल से पराजित कर रहा था। उसकी शासन विस्तार की और धर्म विस्तार की नीति के फलस्वरूप 1185 वर्ष से पृथ्वीराज का गोरी के साथ सङ्घर्ष आरंभ हुआ।
उसके पश्चात् अनेक लघु और मध्यम युद्ध पृथ्वीराज के और गोरी के मध्य हुए।विभिन्न ग्रन्थों में जो युद्ध सङ्ख्याएं मिलती है, वे सङ्ख्या 7, 17, 21 और 28 हैं। सभी युद्धों में पृथ्वीराज ने गोरी को बन्दी बनाया और उसको छोड़ दिया। परन्तु अन्तिम बार नरायन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को रात के अंधेरे में छल कपट से बंदी बना लिया , पश्चात् गोरी ने पृथ्वीराज को कुछ दिनों तक ‘इस्लाम्’-धर्म का अङ्गीकार करवाने का प्रयास करता रहा। उस प्रयोस में पृथ्वीराज को शारीरक पीडाएँ दी गई। शरीरिक यातना देने के समय गोरी ने पृथ्वीराज को अन्धा कर दिया। अन्ध पृथ्वीराज ने अपने मित्र चंदरबरदाई चारण के साथ मिलकर गोरी का वध करने की योजना बनाई,योजना के तहत हिन्दू हृदय सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी विद्या से तीर छोड़कर मोहम्मद गोरी का वध कर दिया ।

शासन व्यवस्था

पृथ्वीराज की शासन व्यवस्था का वर्णन विभिन्न ग्रन्थों में प्राप्त होता है।
सेनापति

  1. स्कन्द – ये गुजरात राज्य के नागर ब्राह्मण थे। वे सेनापति के साथ साथ साम्राज्य के दण्डनायक भी थे।
  2. भुन्नेकम्मल्ल – कर्पूरदेवी के चाचा थे।
  3. उदयराज
  4. उदग – मेडता प्रदेश के सामन्त थे।
  5. कतिया – वीकमपुर के मण्डलेश्वर थे।
  6. गोविन्द – कुत्रचित् उल्लेख मिलता है कि, ये नरायन के द्वितीययुद्ध में मुहम्मद घोरी द्वारा मारे गए। परन्तु जम्मू से प्राप्त एक शिलालेख में उल्लिखित है कि, प्रदेश के नरसिंह नामक राजकुमार ने इनकी हत्या की थी।
  7. गोपालसिंह चौहान – देदरवा-प्रान्त के सामन्त थे।
    मन्त्री
  8. पं. पद्मनाभ – इनकी अध्यक्षता में अन्य मन्त्री भी थे। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के लेखक जयानक, विद्यापति गौड, वाशीश्वर जनार्दन, विश्वरूप और रामभट्ट। रामभट्ट ही चन्दबरदायी नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ही पृथ्वीराज रासो काव्य की रचना की थी।
  9. प्रतापसिंह (इसने पृथ्वीराज के साथ द्रोह किया था। पृथ्वीराज को जब घोरी (ग़ोरी) द्वारा अन्धा किया गया था, तब प्रतापसिंह के साथ मिल कर पृथ्वीराज घोरी को बाण से मारना चाहते थे। परन्तु इस प्रतापसिंह ने घोरी को पृथ्वीराज की योजना बता दी।)
  10. रामदेव
  11. सोमेश्वर
    सेना
    पृथ्वीराज की सेना में अश्व सेना का महत्त्व अधिक था। परन्तु हस्ति (हाथी) सेना और पदाति सैनिकों की भी मुख्य भूमिका रहती थी। पृथ्वीराज जब राजा बने, तब आरम्भिक काल में उनकी सेना में 70,000 अश्वारोही सैनिक थे। जैसे जैसे सैन्याभियान में पृथ्वीराज की विजय होती गई, वैसे वैसे सेना में भी वृद्धि होती गई। तराइन युद्ध में पृथ्वीराज की सेना में 2,00,000 अश्वारोही सैनिक, पाँच सौ गज, अनेक पदाति सैनिक थे। फरिश्ता नाम लेखक के अनुसार पृथ्वीराज की सेना में २ लाख अश्वारोही सैनिक और तीन सहस्र गज थे। डॉ॰ शर्मा फरिश्ता द्वारा उद्धृत संख्या का समर्थन करते हैं।

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