किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष जाँच की प्रक्रिया, एक बार जरूर जानिए

  1. जाँच चलते वक्त किशोर को निगरानी गृह में रखा जाता है।
  2. किशोर न्याय बोर्ड, खास परिस्थितियों के अलावा, किशोर को जमानत पर छोड़ देगी।
  3. किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष मामले को लगातर पेश करना है। यदि किशोर को जमानत पर नहीं छोड़ा जाता है तो, किशोर न्याय बोर्ड को पेशी की तारीख जल्दी जल्दी देनी है, और किसी भी मौके पर यह अवधि 15 दिनों से अधिक नहीं होती है।
  4. एक बार निगरानी गृह में रखे जाने के बाद किसी भी किशोर को किशोर न्याय बोर्ड की पूर्व अनुमति के बगैर विशेष किशोर पुलिस इकाई या पुलिस के सुपूर्द नहीं किया जाएगा। किशोर की हिरासत विशेष किशोर की हिरासत विशेष किशोर पुलिस इकाई या पुलिस के सुपूर्द नहीं करेगा, जब तक की असाधारण स्थितियों में निगरानी में हिरासत न हो। यदि विशेष किशोर पुलिस यूनिट या पुलिस किशोर से पूछताछ करना या TIP करना चाहती है तो उसे इसका आवेदन किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पहले ही देनी है, जिसपर किशोर न्याय बोर्ड को उचित आदेश देना है। यदि ऐसा आवेदन मंजूर होता है तो किशोर न्याय बोर्ड यह निर्देशित करेगा कि ऐसी पूछताछ या TIP निगरानी गृह का निरीक्षक या निगरानी अधिकारी की मौजूदगी में होगा।
  5. किशोर न्याय बोर्ड को किशोर का सर्वोपरी हित ध्यान में रखना है, और सुनि में प्रमुख भूमिका निभानी है कि विशेष किशोर पुलिस इकाई और पुलिस अपनी भूमिका सही ढंग से निभाएं, उदहारण के लिए किशोर न्याय बोर्ड को पुलिस को जल्द चार्जशीट दायर करने व आदेश पर गवाहों को पेश करने का निर्देश देना है।
  6. पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई की जाँच का अंतिम बिन्दु चार्जशीट या पुलिस रिपोर्ट को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष दायर करना है। चार्जशीट में शिकायत कर्त्ता का नाम, सूचना की प्रकृति, कानून का उल्लंघन करने वाले किशोर का नाम, गवाहों के बयान इत्यादि दर्ज न्होते हैं। चार्जशीट पढ़ने के बाद ही न्यायालय यह तय करती है आरोपी के खिलाफ कोई मामला बन रहा है या नहीं, यदि चार्जशीट दायर करने के बाद भी साबुत मिलते हैं तो एक अतिरिक्त चार्जशीट पुलिस या विशेष किशोर पुलिस यूनिट द्वारा दायर की जा सकती है।
  7. चार्जशीट दायर करने पर किशोर न्याय बोर्ड निगरानी अधिकारी की रिपोर्ट या सामाजिक जाँच रिपोर्ट की मांग करेगा, निगरानी अधिकारी सामाजिक जाँच रिपोर्ट सोशल इन्वेस्टीगेशन रिपोर्ट तैयार करते हुए किशोर के माता पिता या अभिभावक से मिलेगा और जरूरत पड़ने पर य्सके घर का दौरा भी करेगा। सामाजिक जाँच रिपोर्ट में निगरानी अधिकार किशोर की पृष्ठभूमि के बारे में उसके माता पिता या अभिभावक उसके जिम्मेदारी लेने लायक हैं या नहीं और किशोर के सम्पूर्ण पुनर्वास के लिए क्या किया जाना चाहिए इसके बारे में बताएगा। सजा देते वक्त सामाजिक जाँच रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किशोर न्याय बोर्ड को किशोर के पुनर्वास से संबंधित फैसला सुनाने से पहले इस रिपोर्ट को ध्यान में रखना आवश्यक है। किसी मान्यता प्राप्त स्वयंसेवी संस्था सभी सामाजिक जाँच रिपोर्ट ली जा सकती है, खास तौर पर तब जब किशोर, बोर्ड के प्रभाव क्षेत्र के बाहर के किसी क्षेत्र से हो।
  8. अगले चरण में किशोर का बयान दर्ज किया जाता है जिसमें उससे यह पुछा जाता है कि उसने अपराध किया है या नहीं। किशोर को संक्षेप में दायर मामले के बारे में उसका बयान दर्ज करने से पहले बताया जाता है।
  9. यदि किशोर अपना अपराध स्वीकार करता है तो बोर्ड यह मान सकती है कि किशोर ने अपराध किया है और किशोर न्याय अधिनियम 2000 के धारा 15 के अंतर्गत फैसला सूना सकती है। किशोर के यह मानने, कि उसने अपराध किया है, के बाद भी बोर्ड जाँच जारी रख सकता है कारणों सहित यह बताने के बाद, कि उसने किशोर का बयान क्यों नहीं माना, आमतौर पर बोर्ड किशोर की स्वीकृत को मान लेती है जबतक उसे यह न लगे की स्वीकृति को मान लेती है जबतक उसे यह न लगे की ऐसा करना किशोर के सर्वोपरी हित में नहीं होगा या फिर उसे अपराध स्वीकार करने के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा धमकाया गया है। किशोर न्याय बोर्ड, निगरानी गृह के निरीक्षक या निगरानी अधिकारी द्वारा किशोर अपराध स्वीकार करने के लिए दबाव बनाने के अभ्यास की भर्त्सना की जानी चाहिए। अक्सर किशोर गलती इसलिए स्वीकार कर लेता है है क्योंकि उसे, उसके माता पिता या अभिभावक को यह बताया जाता है कि अपराध स्वीकार लेना ही मामले को जल्दी निपटाने का एक मात्र तरीका है। किसी किशोर को अपराध स्वीकार करने के लिए बाध्य करना उसे काफी परेशान करता है, अगर उसे छोड़ दिया जाए तब भी क्योंकि इससे उसे ऐसा लगता है कि कुछ गलत किए बिना भी उसे अपराधी के रूप में चिन्हित कर लिया गया है।
  10. किसी किशोर को जिसने अपराध स्वीकार नहीं किया है, को बोर्ड द्वारा अपराध स्वीकार करने दिया जा सकता है अगर ऐसा करना उसके सर्वोपरी हित में हो और अपनी इच्छा से किया गया हो। कोई किशोर अपना अपराध न स्वीकार करने के बाद गलत महसूस कर सकता है और अपना ब्यान बदलने की इच्छा जता सकता है, इसलिए किशोर की ऐसी इच्छा पर कोई रोक नहीं होनी चाहिए।
  11. जब किशोर अपना अपराध स्वीकार नहीं करता या उसके स्वीकृति को बोर्ड नहीं मानती तो किशोर का मामला सबूतों को दर्ज करने के लिए तैयार होता है। सरकारी गवाह बुलाए जाते हैं और उनके बयान दर्ज किए जाते है। बोर्ड को, अतिरिक्त सरकारी वकील को निर्देशित करना चाहिए कि वे चार्जशीट को देखें और सिर्फ जरूरी गवाहों को बुलाएं ताकि मामला गैर जरूरी ढंग से लंबा ने खींचे।
  12. जाँच चलाते वक्त बोर्ड की दंड प्रक्रिया सहिंता द्वारा दी गई प्रक्रिया को मानना चाहिए। गंभीर अपराधों के मामलों में बोर्ड को वारंट केसों की तरह सबूतों को विस्तार से दर्ज करना चाहिए ताकि किशोर के अधिकार की सुरक्षा होनी चाहिए।
  13. सरकारी गवाहों से अतिरिक्त सरकारी वकील द्वारा सरकार की ओर से पूछताछ करनी है और किशोर के वकील द्वारा अतिरिक्त पूछताछ करनी है। बयान को बोर्ड द्वारा दर्ज किया जाता है और सबूतों के नोट की एक प्रति बिना चुके किशोर के वकील को दी जाती है।
  14. किशोर न्याय बोर्ड को हर हाल में यह सुनिश्चित करना है कि तय तिथि में सरकारी गवाह अपना बयान देने के लिए हाजिर हो, और यदि ऐसा नहीं होता तो बोर्ड पुलिस से इस अनुपस्थिति की रिपोर्ट लेगी। यदि कोई सरकारी गवाह हाजिर नहीं होता तो बोर्ड उनकी उपस्थति सुनिश्चित करने के लिए जमानती या गैर जमानती वारंट दर्ज कर सकती है या उसका मामला बंद करने के लिए सरकार के पक्ष से बात कर सकती है।
  15. आरोप पक्ष की ओर से मामले को बंद किए जाने के बाद, दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 313 के अंतर्गत किशोर का बयान बोर्ड द्वारा दर्ज किया जाता है। बोर्ड द्वारा प्रश्न किए जायेंगे कि किशोर यह बता सके की बयानों का कोई हिस्सा उसे अपराधी तो नहीं ठहराता, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत बयान दर्ज करते हुए उससे कोई प्रतिज्ञा नहीं दिलवाई जानी है और न ही किसी गलत जवाब के लिए उसे सजा का हकदार बनाया जाता है। किशोर का बयान आरोप पक्ष के सबूतों का विकल्प नहीं माना जा सकता आरोप पक्ष को स्वतंत्र रूप से अपराध साबित करना है। किशोर के बयान को बोर्ड द्वारा आरोप पक्ष के द्वारा पेश सबूतों के साथ मिला कर देखना है।
  16. किशोर यदि अपने बचाव व आरोप पक्ष अपनी मौखिक बहस चलाएंगे, लिखित तर्क उन फैसलों के साथ, जिन पर तर्क गढ़े गए हैं बोर्ड के समक्ष दोनों पक्षों द्वारा दिए जा सकते हैं।
  17. इसके बाद बचाव व आरोप पक्ष अपनी मौखिक बहस चलायेंगे, लिखित तर्क, उन फैसलों के साथ, जिन पर तर्क गढ़ गए हैं बोर्ड के समक्ष दोनों पक्षों द्वारा दिए जा सकते हैं।
  18. पेश किए गए सबूतों और दिए गए तर्कों के आधार बोर्ड मामले में अंतिम फैसला सुनाएगा। यदि बोर्ड इस बात पर संतुष्ट है कि किशोर ने अपराध किया है तो बचाव पक्ष को सजा पर बहस करने का मौका, फैसले सुनाने के पहले दिया जाना चाहिए। जाँच की वक्त किशोर को ऐसा माहौल दिया जाना चाहिए कि वह आराम से रह न की कृतज्ञता या डर की भावना से भर जाए। बैठने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए ताकि बोर्ड व किशोर दोनों एक ही स्तर पर हों। बोर्ड को धीरे धीरे व ऐसी भाषा या तरीके से बात करनी है जो किशोर की समझ में आए, राज्य सरकार द्वारा बोर्ड को उपयुक्त ढाँचा व मानव संसाधन मुहैया करवाया जाना चाहिए जिसमें निगरानी अधिकारी, स्टेनो – टाइपिस्ट या कम्प्युटर ऑपरेटर, चपरासी व सफाई कर्मचारी शामिल हैं।

Leave a Comment