वर्साय की संधि के प्रावधान

राष्ट्रसंघ
राष्ट्रसंघ का निर्माण एवं संगठन वर्साय-संधि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग था। संधि के प्रथम भाग का संबंध इसी से है। यह मूलतः राष्ट्रपति विल्सन का सृजन था। उसका ख्याल था कि राष्ट्रसंघ को शांति-सम्मेलन की सबसे महान कृति होनी चाहिए। लायड जॉर्ज ने लिखा है विल्सन शांति-संधियों के केवल उस भाग को जिसमें राष्ट्रसंघ की व्यवस्था थी, सबसे अधिक महत्व देता था। इसके लिए वह कोई भी त्याग करने के लिए तैयार था और अंत में उसके कठिन प्रयास से ही राष्ट्रसंघ का निर्माण हुआ। विल्सन को छोड़कर मित्रराष्ट्र के अन्य प्रतिनिधियों का यह विचार था कि राष्ट्रसंघ संबंधी बातों को वर्साय-संधि के अंतर्गत रखना आवश्यक नहीं है। अन्ततः विल्सन की बात मान ली गयी और राष्ट्रसंघ के संविधान को वर्साय-संधि के अंतर्गत ही रख दिया गया। वर्साय-संधि की प्रथम 26 धाराएँ राष्ट्रसंघ का संविधान ही है, जिसका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को कायम रखना था।
प्रादेशिक व्यवस्था
एल्सस-लॉरेन प्रदेश : वर्साय-संधि द्वारा प्रादेशिक परिवर्तन करके जर्मनी का अंग-भंग कर दिया गया। 1871 में जर्मनी ने फ्रांस से एल्सेस-लॉरेन के प्रदेश छीन लिये थे। सबों ने एक स्वर से इस बात को स्वीकार किया कि यह एक गलत काम हुआ था और इसका अंत आवश्यक है। अतः संधि की शर्तों के द्वारा एल्सस-लोरेन के प्रदेश फ्रांस को वापस दे दिये गये।
राइनलैंड : फ्रांस की सुरक्षा की दृष्टि से जर्मनी के राइनलैण्ड में मित्र राष्ट्रों की सेना 15 वर्षों तक रहेगी तथा राइन नदी के आस-पास के क्षेत्र को स्थाई रूप से निःशस्त्र कर दिया जाए ताकि जर्मनी किसी प्रकार की किलेबंदी न कर सके।
सार क्षेत्र : सार क्षेत्र जर्मनी में कोयला क्षेत्र के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रदेश की शासन व्यवस्था की जिम्मेवारी राष्ट्रसंघ को सौंप दी गई किन्तु कोयले की खानों का स्वामित्व फ्रांस को दिया गया। यह भी तय हुआ कि 15 वर्षों बाद जनमत संग्रह द्वारा निश्चित किया जाएगा कि सार क्षेत्र के लोग जर्मनी के साथ रहना चाहते हैं या फ्रांस के साथ। यदि सारवासी जर्मनी के साथ मिलने की इच्छा प्रकट करें तो जर्मनी फ्रांस को निश्चित मूल्य देकर खानों को पुनः खरीद ले।
बेल्जियम एवं डेनमार्क की प्राप्ति : यूपेन मार्शनेट और मलमेडी का प्रदेश बेल्जियम के अधीन कर दिया गया। श्लेशविग में जनमत संग्रह करके उसका उत्तरी भाग डेनमार्क को दे दिया गया।
जर्मनी की पूर्वी सीमा : जर्मनी को सबसे अधिक नुकसान पूर्वी सीमा पर उठाना पड़ा। मित्र राष्ट्रों ने स्वतंत्र पोलैण्ड राज्य के निर्माण का निर्णय किया। डान्जिंग को स्वतंत्र नगर के रूप में परिवर्तित किया गया और उसे राष्ट्र संघ के संरक्षण में रख दिया गया। पोलैण्ड को समुद्री मार्ग देने के लिए डाजिंग के बंदरगाह का उपयोग करने का अधिकार दिया गया। मेमेल का बंदरगाह जर्मनी से लेकर लिथुआनिया को दे दिया गया। जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया के राज्य को मान्यता दी। इस प्रकार प्रादेशिक व्यवस्था के तहत जर्मनी को 25 हजार वर्ग मील का प्रदेश और 70 लाख की आबादी खोनी पड़ी।
जर्मन उपनिवेश संबंधी व्यवस्था : मित्र राष्ट्र जर्मन उपनिवेशों को अपने-अपने साम्राज्य में मिलना चाहते थे किन्तु विल्सन ने इसका कड़ा विरोध किया। विल्सन के विरोध के कारण मित्र राष्ट्रों ने संरक्षण प्रणाली की शुरूआत की। इसका आशय यह था कि जो देश बहुत पिछड़े हुए है उनका समुचित कल्याण व विकास करना। सभ्य राष्ट्रों में पवित्र धरोहर के रूप राष्ट्रसंघ की ओर से इसकी उन्नति के लिए दिया जाना चाहिए। Mindet व्यवस्था के तहत जर्मनी को अपनी सभी उपनिवेश छोड़ने पड़े और उन्हें मित्र-राष्ट्रों के संरक्षण में रखा गया। प्रशांत महासागर के कई द्वीपों तथा अफ्रीकी महादेशों में स्थित उपनिवेश जर्मनी को खोने पड़े।
सैनिक व्यवस्था
जर्मन सेना की अधिकतम संख्या एक लाख कर दी गई। अनिवार्य सैनिक सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हवाई जहाजों को प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त नौसेना शक्ति को भी सीमित कर दिया गया। जर्मनी की नौसेना के केवल 6 युद्धपोत रखने की इजाजत दी गई। पनडुब्बियों को मित्र राष्ट्रों को सौंपने की बात की गई। निःशस्त्रीकरण की इस व्यवस्था का पालन करवाने तथा निगरानी रखने के लिए जर्मनी के खर्च पर मित्र राष्ट्रों का एक सैनिक आयोग स्थापित किया गया। इस प्रकार सैनिक दृष्टि से जर्मनी को पंगु बना दिया गया।
आर्थिक व्यवस्था
वर्साय संधि की 231वीं धारा के तहत जर्मनी व उसके सहयोगी राज्यों को युद्ध के लिए एक मात्र जिम्मेदार माना गया। अतः मित्रराष्ट्रों को युद्ध में जो क्षतिपूर्ति उठानी पड़ी थी, उसके लिए जर्मनी को क्षतिपूर्ति करने को कहा गया कि 1921 तक जर्मनी 5 अरब डालर मित्रराष्ट्रों को दे। मित्र राष्ट्रों को जर्मनी से कुछ वस्तु के आयात-निर्यात पर विशेष सुविधाएं दी गई। नील नहर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण कर उसे सभी जहाजों के लिए खुला छोड़ दिया गया।
नैतिक दायित्व
संधि की 231वीं धारा के अनुसार सारी क्षति और युद्ध के लिए जर्मनी को उत्तरदायी ठहराया गया।
राजनैतिक व्यवस्था
राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्रसंघ की स्थापना वार्साय की संधि का महत्वपूर्ण अंग थी। विल्सन के प्रभाव के कारण ही राष्ट्रसंघ की धाराओं को वार्साय की संधि में रखा गया। राष्ट्रसंघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सुरक्षा को कायम करना था।

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