सार्वजनिक वितरण प्रणाली

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) एक भारतीय खाद्य सुरक्षा प्रणाली है। भारत में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अधीन तथा भारत सरकार द्वारा स्थापित और राज्य सरकारों के साथ संयुक्त रूप भारत के गरीबों के लिए सब्सिडी वाले खाद्य और गैर खाद्य वस्तुओं वितरित करता है। यह योजना एक जून को भारत में लॉन्च की गयी थी। 1997 में वस्तुओं,मुख्य भोजन में अनाज, गेहूं, चावल, चीनी, और मिट्टी का तेल को उचित मूल्य की दुकानों( जिन्हें राशन की दुकानों के रूप में भी जाना जाता है) के एक नेटवर्क जो देश भर में कई राज्यों में स्थापित है के माध्यम से वितरित किया गया। भारतीय खाद्य निगम, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली निगम है, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को संभालती है।
कवरेज और सार्वजनिक व्यय में, यह सबसे महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा नेटवर्क माना जाता है। हालांकि, खाद्य राशन की दुकानों द्वारा जितना अनाज वितरित किया जाता है वह गरीबों की खपत जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं या घटिया गुणवत्ता का है। भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनाज की खपत का औसत स्तर प्रति व्यक्ति / माह केवल 1 किलो है। पीडीएस द्वारा शहरी पक्षपात और प्रभावी ढंग से आबादी के गरीब वर्गों की सेवा में अपनी विफलता के लिए आलोचना की गई है। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली महंगी है और इसकी जटिल प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को जन्म देती है। आज भारत के पास चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा अनाज स्टॉक है, जिस पर सरकार 750 अरब रूपये (13.8 अरब $) प्रति वर्ष खर्च करती है। जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1 प्रतिशत है तब भी अभी तक 21% कुपोषित हैं।देश भर में गरीब लोगों को राज्य सरकारों द्वारा खाद्यान्न का वितरण किया जाता है के लिए। आज की तारीख में भारत में 5,00,000 उचित मूल्य की दुकानों (एफपीएस) हैं।

अवलोकन

केंद्र और राज्य सरकारों ने पीडीएस को विनियमित करने की जिम्मेदारी साझा की है। केंद्रीय सरकार खरीद, भंडारण, परिवहन, और अनाज के थोक आवंटन के लिए जिम्मेदार है, जबकि राज्य सरकारों को उचित मूल्य की दुकानों (FPSs) के स्थापित नेटवर्क के माध्यम से उपभोक्ताओं तक इसके वितरण की जिम्मेदारी है। राज्य सरकारों को आवंटन और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की पहचान, राशन कार्ड जारी करने, पर्यवेक्षण और FPS के कामकाज की निगरानी सहित परिचालन की जिम्मेदारियों भी हैं। पीडीएस योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे के प्रत्येक परिवार हर महीने 35 किलोग्राम चावल या गेहूं के लिए पात्र है, जबकि गरीबी रेखा से ऊपर एक घर मासिक आधार पर 15 किलो खाद्यान्न का हकदार है।

सार्वजानिक वितरण प्रणाली की दुकानें

एक सार्वजनिक वितरण दुकान, को उचित मूल्य की दुकान (एफपीएस) के रूप में जाना जाता है, भारत के सार्वजनिक वितरण, भारत सरकार द्वारा स्थापित प्रणाली है जो गरीबों को रियायती मूल्य पर राशन वितरित करती है, का एक हिस्सा है। स्थानीय स्तर पर इनको “राशन की दुकानों के रूप में जाना जाता है” और मुख्यत: बाजार मूल्य से कम पर गेहूं, चावल, मिट्टी का तेल और चीनी व अन्य आवश्यक वस्तुओं को यहं बेचा जाता है। इन्हें खरीदने के लिए एक राशन कार्ड (गुलाबी कार्ड) होना आवश्यक है। भारत के पास 5 लाख दुकानों का दुनिया का सबसे बड़ा वितरण नेटवर्क है।
राशन प्रणाली का प्रयोग 1940 में बंगाल भुखमरी के बाद से किया जा रहा है।

ऑपरेशन ब्लैक

14 अक्टूबर 2013 को आज तक पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर ऑपरेशन ब्लैक नामक एक स्टिंग आपरेशन किया। इससे पता चला कि कैसे वितरण उचित मूल्य की दुकानों के बजाय मिलों तक पहुंच जाता है। दिलचस्प बात यह है कम्प्यूटरीकरण के माध्यम से सभी दस्तावेज ठीक हैं।
एनडीटीवी ने एक शो किया जिसमें यह दिखाया गया कि कैसे छत्तीसगढ़ खाद्य विभाग ने अपनी टूटी प्रणाली को ठीक किया और अनाज के लीकेज को 2009-10 में लगभग 10% कर दिया जो 2004-5 में लगभग 50% था।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर शोध से पता चलता है (जैसा कि इन दो कार्यक्रमों में दिखा ) कि उसकी स्थिति देश भर में काफी भिन्न है।

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