ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल में भूमिका

18 वीं और 19वीं सदी के दौरान ब्रिटेन के औपनिवेशिक विस्तार द्वारा, ब्रिटेन ने विश्व के अन्य अनेक भू-भागों वे क्षेत्रों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। जिनमें से अधिकतर देशों ने मध्य 20 वीं सदी तक ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल कर ली। हालाँकि उन सभी देशों ने यूनाइटेड किंगडम की सरकार की अधिपत्यता को नकार दिया, परंतु उनमें से कई राष्ट्र, ब्रिटिश शासक को अपने अधिराट् के रूप में मान्यता देते हैं। ऐसे देहों राष्ट्रमण्डल प्रदेश या राष्ट्रमण्डल प्रजाभूमि कहा जाता है। वर्त्तमान काल में, यूनाइटेड किंगडम के अधिराट् केवल यूनाइटेड किंगडम के ही नहीं बल्कि उसके अतिरिक्त कुल 15 अन्य राष्ट्रों के अधिराट् भी हैं। हालांकि इन राष्ट्रों में भी उन्हें लगभग सामान पद व अधिकार प्राप्त है जैसा की ब्रिटेन में, परंतु उन देशों में, उनका कोई वास्तविक राजनीतिक या पारंपरिक कर्त्तव्य नहीं है, शासक के लगभग सारे कर्त्तव्य उनके प्रतनिधि के रूप में उस देश के महाराज्यपाल(गवर्नर-जनरल) पूरा करते हैं। ब्रिटेन की सरकार का राष्ट्रमण्डल प्रदेशों की सरकारों के कार्य में कोई भी भूमिका या हस्तक्षेप नहीं है। ब्रिटेन के अलावा राष्ट्रमण्डल आयाम में: एंटीगुआ और बारबुडा, ऑस्ट्रेलिया, बहामा, बारबाडोस, बेलिज, ग्रेनेडा, जमैका, कनाडा, न्यूजीलैंड, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप, सेंट लूसिया, सेंट किट्स और नेविस, सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस और तुवालु जैसे देश शामिल हैं।
पूर्वतः राष्ट्रों के राष्ट्रमण्डल के सारे देश राष्ट्रमण्डल परिभूमि के हिस्सा हुआ करते थे, परंतु 1950 में भारत ने स्वतंत्रता के पश्चात स्वयं को गणराज्य घोषित किया, और ब्रिटिश राजसत्ता की राष्ट्रप्रमुख के रूप में संप्रभुता को भी खत्म कर दिया। परंतु भारत ने राष्ट्रमण्डल की सदस्यता बरक़रार राखी। उसके बाद से, राष्ट्रमण्डल देशों में, ब्रिटिश संप्रभु को (चाहे राष्ट्रप्रमुख हों या नहीं) “राष्ट्रमण्डल के प्रमुख” का पद भी दिया जाता है, जो राष्ट्रमण्डल के संगठन का नाममात्र प्रमुख का पद है। इस पद का कोई राजनैतिक अर्थ नहीं है।

उत्तराधिकार
राष्ट्रमण्डल प्रदेशों के बीच का संबंध इस प्रकार का है की उत्तराधिकार को अनुशासित करने वाले किसी भी बिधान का सारे देशों की एकमत स्वीकृति आवश्यक है। सिंघासन पर उत्तराधिकार, विभिन्न ऐतिहासिक संविधिओं द्वारा अनुशासित है, जिनमें बिल ऑफ़ राइट्स, 1689, ऍक्ट ऑफ़ सेटलमेंट, 1701 और ऍक्ट ऑफ़ यूनियन, 1707 शामिल हैं। उत्तराधिकार संबंधित नियम केवल संसदीय अधिनियम द्वारा परिवर्तित किये जा सकते हैं, सिंघासन का कोई उत्तराधिकारी, स्वेच्छा से अपना उत्तराधिकार त्याग नहीं कर सकता है। सिंघासन पर विराजमान होने के पश्चात एक व्यक्ति अपने निधन तक राज करता है। इतिहास में एकमात्र स्वैछिक पदत्याग, 1936 में एडवर्ड अष्टम ने किया था, जिसे संसद के विशेष अधिनियम द्वारा वैध क़रारा गया था। अंतिम बार जब किसी शासक को अनैच्छिक रूप से निष्काषित किया गया था, वो था 1688 में जेम्स सप्तम और द्वितीय जिन्हें ग्लोरियस रेवोल्यूशन(गौरवशाली क्रांति) के समय निष्काषित किया गया था।
ऍक्ट ऑफ़ सेटलमेंट, 1701, उत्तराधिकार को सोफ़िया ऑफ़ हॅनोवर(1630-1714), जेम्स प्रथम की एक पोती, के वैधिक प्रोटेस्टेंट वंशजों तक सीमित करता है। अतः राजपरिवार का कोई भी कैथलिक सदस्य कभी भी सिंघासन को उत्तरिधिकृत नहीं कर सकता है। एक शासी शासक के निधन पर स्वयमेव ही, राजपाठ, उसके आसन्न वारिस के पास चला जाता है, अतः सैद्धांतिक रूप से, सिंघासन एक क्षण के लिए भी खली नहीं रहता है। तथा उत्तराधिकार को सार्वजनिक रूप से उत्तराधिकार परिषद् द्वारा घोषित की जाती है। अतः अंग्रेजी परंपरा के अनुसार शासक के उत्तराधिकार को वैध होने के लिए राज्याभिषेक होना आवश्यक नहीं है। अतः आम तौर पर राज्याभिषेक उत्तराधिकार के कुछ महीने बाद होता है(ताकि आवश्यक तैयारी और शोक के लिए समय मिल सके)। नए शासक के राज्याभिषेक की परंपरा वेस्टमिंस्टर ऐबे में कैंटरबरी के आर्चबिशप द्वारा किया जाता है।
उत्तराधिकारी के लिंग और घर्म संबंधित विधान
ऐतिहासिक रूप से उत्तराधिकार को पुरुष-वरियति सजातीय ज्येष्ठाधिकार के सिद्धान्त द्वारा अनुशासित किया जाता रहा है, जिसमे पुत्रों को ज्येष्ठ पुत्रियों पर प्राथमिकता दी जाती रही है, तथा एक ही लिंग के ज्येष्ठ संतानों को पहली प्राथमिकता दी जाती है। अतः उत्तराधिकारी के लिंग तथा धर्म का उत्तराधिकार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। 2011 में राष्ट्रमण्डल की बैठक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने यह घोषणा की थी कि तमाम राष्ट्रमण्डल प्रदेश पुरुष प्राथमिकता की परंपरा को समाप्त करने के लिए राज़ी हो गए हैं, तथा भविष्य के शासकों पर कैथोलिक व्यक्तियों से विवाह करने पर रोक को भी रद्द करने पर सब की स्वीकृति ले ली गयी थी। परंतु क्योंकि ब्रिटिश अधिराट् चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के प्रमुख भी होते हैं, अतः कैथोलिक व्यक्तियों को सिंघासन उत्तराधिकृत करने पर रोक लगाने वाले विधान को यथास्त रखा गया है। इस विधेयक को 23 अप्रैल 2013 को शाही स्वीकृति मिली, तथा सारे राष्ट्रमण्डल प्रदेशों में सम्बंधित विथान पारित होने के पश्चात् मार्च 2015 को यह लागू हुआ।
प्रतिशासन व्यवस्था
1937 और 1953 में रीजेंसी के अधिनियमों के मुताबिक, बिजली सम्राट के 18 साल हासिल नहीं किया है, या तो शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम, बाहर किया जाना चाहिए रीजेंट के रूप में। गिन्नी के पति या पत्नी,: विकलांगता निम्नलिखित व्यक्तियों के कम से कम तीन की पुष्टि करनी होगी लॉर्ड चांसलर , हाउस ऑफ कॉमन्स के स्पीकर , भगवान उच्च वकील (प्रभु मुख्य न्यायाधीश), और स्क्रॉल के रक्षक। रीजेंसी को पूरा करने के लिए, यह भी एक ही तीन व्यक्तियों की एक घोषणा की आवश्यकता है।
जब आवश्यक हो रीजेंसी, उत्तराधिकार की उचित लाइन के बाद रीजेंट बन जाता है; संसदीय मतदान या कुछ और इलाज की जरूरत है। रीजेंट (के मामले में 18 से 21 साल से अधिक पुराना होना चाहिए एक प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी या, अन्यथा), ब्रिटिश नागरिकता है, और ब्रिटेन का निवासी होना। इन नियमों के अनुसार, केवल रीजेंट भविष्य था जॉर्ज चतुर्थ , जो राज्य करता रहा जब उनके पिता जॉर्ज III पागल हो गया था (1811-1820)।
हालांकि, 1953 में रीजेंसी के अधिनियम कहता है कि अगर रानी के उत्तराधिकारी रीजेंसी की जरूरत है, राजकुमार फिलिप, एडिनबर्ग के ड्यूक (रानी का पति) रीजेंट है। रीजेंसी रानी की आवश्यकता होगी, तो रीजेंट बोर्ड की लाइन में अगले हो जाएगा (- रीजेंट होगा तो प्रिंस फिलिप बच्चों और रानी के पोते को छोड़कर)। अस्थायी शारीरिक विकलांगता या राज्य से अनुपस्थिति के दौरान गिन्नी के अपने कार्यों प्रतिनिधि सकता सलाहकार राज्य , पति या सबसे अच्छा चार उत्तराधिकार की लाइन पर पहले। राज्य की आवश्यकताओं के सलाहकार रीजेंट के रूप में वही कर रहे हैं। वर्तमान में, पांच राज्यों के पार्षदों:
प्रिंस फिलिप, एडिनबर्ग के ड्यूक ,
चार्ल्स, प्रिंस ऑफ वेल्स ,
वेल्स के प्रिंस विलियम ,
प्रिंस हैरी
प्रिंस एंड्रयू, ड्यूक ऑफ यॉर्क

Leave a Comment