तुलसी की वैज्ञानिक खेती, आइए जाने

तुलसी की ओसिमम प्रजाति को तेल उत्पादन के लिए उगाया जाता है। तुलसी की इस प्रजाति की भारत में बड़े पैमाने पर खेती होती है। उत्तर प्रदेश में बरेली, बादयूं, मुरादाबाद और सीतापुर जिलों में तथा बिहार के मुंगेर जिला में इसकी खेती की जाती है। इसका प्रयोग परफ्यूम व कास्मेटिक इंडस्ट्रीज में अधिक होता है। तूलसी की ओसीमस सेंक्टेम प्रजाति के सारभूत तेल की अधिक कीमत होती है, किन्तु तेल की मात्रा कम मिलती है।

तुलसी की विभिन्न प्रजतियां
भारत में तुलसी का पौधा धार्मिक एवं औषधीय महत्व का है। इसे हिंदी में तुलसी, संस्कृत में सुलभा, ग्राम्या, बहूभंजरी एवं अंग्रेजी में होली बेसिल के नाम से जाना जाता है। लेमिएसी कूल के इस पौधे की विश्व में 150 से ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसकी मूल प्रकृति एवं गुण एक समान हैं।
प्रमुख प्रजातियाँ निम्न प्रकार हैं :

  1. बेसिल तुलसी या फ्रेंच बेसिल
    (i) स्वीट फेंच बेसिल या बोबई तुलसी
    (ii) कर्पूर तुलसी
    (iii) काली तुलसी
    (iv) वन तुलसी या राम तुलसी
    (v) जंगली तुलसी
  2. होली बेसिल
    (i) श्री तुलसी या श्यामा तुलसी
    तुलसी अत्यधिक औषधीय उपयोग का पौधा है। जिसकी महत्ता पुरानी चिकित्सा पद्धति एवं आधुनिक चिकित्सा पद्धति दोनों में है। वर्त्तमान में इससे अनेकों खाँसी की दवाएँ साबुन, हेयर शैम्पू आदि बनाए जाते लगे हैं। जिससे तुलसी के उत्पाद की मांग काफी बढ़ गई है। अत: मांग की पूर्ति बिना खेती के संभव नहीं हैं।
    मृदा व जलवायु
    इसकी खेती, कम उपजाऊ जमीन जिसमें पानी की निकासी का उचित प्रबंध हो, अच्छी होती है बलूई दोमट जमीन इसके लिए बहुत उपयुक्त होती हैं। इसके लिए उष्ण कटिबंध एवं कटिबंधीय दोनों तरह जलवायु होती है।
    जमीन की तैयारी
    जमीन की तैयारी ठीक तरह से कर लेनी चाहिए। जमीन जों के दूसरे सप्ताह तक तैयार हो जानी चाहिए।
    बुवाई / रोपाई
    इसकी खेती बीज द्वारा होती है लेकिन खेती में बीज की बुवाई सीधे नहीं करनी चाहिए। पहले इसकी नर्सरी तैयार करनी चाहिए। बाद में उसकी रोपाई करनी चाहिए।
    पौध तैयार करना
    जमीन की 15 – 20 सेमी. गहरी खुदाई कर के खरपतवार आदि निकाल तैयार करा लेना चाहिए। 15 टन प्रति हे. की दर से गोबर की सड़ी खाद अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। 1 मी. X 1 मी. आकार की जमीन सतह से उभरी हुई क्यारियां बना कर उचित मात्र में कंपोस्ट एवं उर्वरक मिला दिन चाहिए। 750 ग्रा. – 1 किग्रा. बीज एक हेक्टयेर के लिए पर्याप्त होता है। बीज की बुवाई 1:10 के अनुपात में रेत या बालू मिला कर 8-10 सेमी. की दूरी पर पक्तियां में करनी चाहिए। बीज की गहराई अधिक नहीं होनी चाहिए। जमाव के 15-20 दिन बाद 20 कि./ हे. की दर से नेत्रजन डालना उपयोगी होता है। पांच- छह सप्ताह में पौध रोपाई हेतु तैयार हो जाती है।
    रोपाई
    सूखे मौसम में रोपाई हमेशा दोपहर के बाद करनी चाहिए। रोपाई के बाद खेत को सिंचाई तुरंत कर देनी चाहिए। बादल या हल्की वर्षा वाले दिन इसकी रोपाई के लिए बहुत उपयुक्त होते हैं। इसकी रोपाई लाइन में लाइन 60 से. मी. तथा पौधे से पौधे 30 से. मी. की दूरी पर करनी चाहिए।
    खरपतवार नियंत्रण
    इसकी पहली निराई गुड़ाई रोपाई के एक माह बाद करनी चाहिए। दूसरी निराई – गुड़ाई पहली निराई के 3-4 सप्ताह बाद करनी चाहिए। बड़े क्षेत्रों में गुड़ाई ट्रैक्टर से की जा सकती है।
    उर्वरक
    इसके लिए 15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद जमीन में डालना चाहिए। इसके अलावा 75-80 किग्रा. नेत्रजन 40-40 किग्रा. फास्फोरस व पोटाश की आवश्यता होती है। रोपाई के पहले एक तिहाई नेत्रजन तथा फस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत में डालकर जमीन में मिला देने चाहिए। शेष नेत्रजन की मात्रा दो बार में खड़ी फसल में डालना चाहिए।
    कटाई
    जब पौधे में पूरी तरह से फूल आ जाए तथा नीचे के पत्ते पीले पड़ने लगे तो इसकी कटाई कर लेनी चाहिए। रोपाई के 10-12 सप्ताह के बाद यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
    आसवन : तुलसी का तेल पूरे पौधे के आसवन से प्राप्त होता है। इसका आसवन, जल तथा वाष्प, आसवन, दोनों विधि से किया जा सकता है। लेकिन वाष्प आसवन सबसे ज्यादा उपयुक्त होता है। कटाई के बाद तुलसी के पौधे को 4-5 घंटे छोड़ देना चाहिए। इससे आसवन में सुविधा होती है।
    पैदावार
    इसके फसल की औसत पैदावार 20 – 25 टन प्रति हेक्टेयर तथा तेल का पैदावार 80-100 किग्रा. हेक्टेयर तक होता है।
    आय – व्यय विवरण
    प्रति हेक्टेयर व्यय – रू. 10,500
    तेल का पैदावार – 85 किलो प्रति हेक्टेयर
    टेल की कीमत – 450 – रूपया प्रति किलो – 8/5 X 450 = 38,250
    शुद्ध लाभ = रू. 38, 250 – 10,500 = 27,750

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