लिंग का विकास तथा निर्धारण

जनन का इतिहास देखा जाए तो ज्ञात होगा कि संसार के आदि जीवों की उत्पत्ति अलैंगिक (asexual) ढंग से हुई; जैसे प्रोटोज़ोआ (Protozoa) तथा प्रोटोफ़ाइटा (Protophyta) के अनेक रूपों में नर तथा मादा द्वारा मिलकर सृष्टि नहीं हुई। इन जीवों की उत्पत्ति शरीर विखंडन (fission), मुकुलन (budding) तथा बीजाणु निर्माण (spore formation) द्वारा हुई। विकास के दूसरे चरण में नर तथा मादा के अत्यंत सूक्ष्म लक्षण प्रकट होने लगे। प्रोटोज़ोआ श्रेणी के कुछ अन्य जीव संयुग्मन (conjugation) द्वारा संतानोत्पादन करने लगे। इसमें एक ही प्रकार के दो जीव आपस में मिलकर एकाकार होने पर फिर विभाजित होकर अनेक संख्या में उत्पन्न होने लगे, जैसे वॉल्वॉक्स (Volvox) के निवहों (colonies) में देखा जाता है। इसके पश्चात् लिंग विकास की तीसरी अवस्था आई, जिसमें एक ही प्राणी के अंदर नर तथा मादा दोनों जननांग विकसित हुए, जैसे, केंचुआ (earth-worm), जोंक (leech) आदि में। लिंग विकास की अंतिम अवस्था में नर तथा मादा जननांग सर्वथा पृथक् हो गए, जैसा कुत्तों, बंदरों, गाय, बकरियों तथा मनुष्यों आदि में देखा जाता है। प्राथमिक लैंगिक लक्षणों के अंतर्गत नर में वृषण (testes) तथा मादा में अंडाशय (ovaries) आते हैं। गौण लैंगिक लक्षणों में उन अंगों तथा लक्षणों की गणना की जाती है, जिनसे नर और मादा को उनकी आकारिकी (morphology) द्वारा ही पृथक् पहचान लिया जाता है, जैसे कुछ कशेरुकी (vertebrate) जंतुओं में मैथुनांगों (copulatory organs) को स्पष्टत: पृथक् देखा जा सकता है। नर प्राणी में शिश्न (penis) तथा मादा में भग (vulva) मैथुनांग होते हैं। कतिपय अन्य जीवों में गौण लैंगिक लक्षणों के अंतर्गत मूँछ, दाढ़ी, सुंदर तथा भड़कीले पंख, सिर की कलगी, सींग, स्तन, प्रभुत्व जमाना, मधुर स्वर, मातृत्व की इच्छा, आक्रमण क्षमता आदि आते हैं। इसी प्रकार वनस्पति जगत में भी फूलों की सुगंध, रंग, भड़कीलापन, फलोत्पादन आदि लैंगिक लक्षण होते हैं।

लिंग का निर्धारण

प्राणियों में लिंग का निर्धारण तीन प्रकार से होता है :
(1) निषेचन (fertilization) के पहले ही,
(2) निषेचन के समय तथा
(3) निषेचन के बाद।
किंतु, सामान्यतः लिंग का निर्धारण निषेचन के ही समय होना माना जाता है। नर के शुक्राणु (sperm) का मादा के अंडाशय से संयुक्त होना निषेचन कहा जाता है। वातावरण में निषेचित अंडे, या युग्मनज (fertilized egg or Zygote) की क्रमश: वृद्धि होती रहती है।
नर तथा मादा का निर्धारण कुछ जटिल प्रक्रियाओं द्वारा होता है। वैज्ञानिकों ने इस संबंध में कई सिद्धांत उपस्थित किए हैं। इन सिद्धांतों में निम्नलिखित दो सिद्धांत अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध हैं : (1) गुणसूत्र, या क्रोमोसोम सिद्धांत तथा (2) हॉर्मोन सिद्धांत।

क्रोमोसोम सिद्धांत

आनुवंशिक विज्ञान (Genetics) के अनुसार प्राणियों के शरीर में जो कोशिकाएँ (cells) पाई जाती हैं, उनमें कुछ ऐसी रचनाएँ होती है जो विशेष प्रकार के रंजकों और अभिरंजकों (dyes and stains) को ग्रहण कर लेती हैं, इन रचनाओं को क्रोमोसोम कहा जाता है। आनुवंशिक विज्ञान में विशेषकर युग्मकों, या लिंग कोशिकाओं (gametes or sex-cells) में पाए जाने वाले क्रोमोसोमों पर ही विचार किया जाता हे। भिन्न-भिन्न प्राणियों की जनन कोशिकाओं में क्रोमोसोमों की संख्या इस प्रकार पाई गई हैं :
प्राणी का नाम — क्रोमोसोमों की संख्या
साइकन (Sycon) स्पंज — 26
हाइड्रा (Hydra) — 30 – 32
लंब्रिकस (Lumbricus) वंश की जोंक — 32
यूनियो (Unio) सीप — 32
तारामीन (Starfish) — 36
झींगा (Squilla) मछली — 48
बिच्छी (Buthus) — 24
एक मछली (Scyllium) — 24
ब्यूफोटोड (Bufo toad) — 24 – 26
कच्छपगण (Chelonia) — 56
मगर (Crocodile) — 32
भेड़ (Sheep) — 60
घोड़ा (Horse) — 60 – 66
बंदर (Monkey) — 48
मानव (Humans) — 46
नेट्रिक्स (Natrix) — 40
कपोतवंश या कोलंबा (Columba) — 66
मुर्गा (Fowl) — 18 – 20
चमगादड़ (Bat) — 24
लीपस (Lepus) वंश का खरगोश — 28 – 36
कुत्ता (Dog) — 50 – 78
लोमड़ी (Fox) — 38
बिल्ली (Cat) — 66
चौपाए (Cattle) — 38 – 60
बकरा (Goat) — 60
भैंसा (Buffalo) — 48 – 56
सूअर (Pig) — 38 – 40
चिंपैंजी (Chimpanzee) — 48
ऊँट (Camel) — 70
सन् 1901-2 में मैक्क्लंग (Macclung) नामक विद्वान् ने क्रोमोसोम का पता लगाया। उसी ने कुछ सिद्धांत भी बनाए, जो कालांतर में वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा पुष्ट होते गए। इस सिद्धांत में यह माना जाता है कि प्रत्येक प्राणी के कुछ विशिष्ट क्रोमोसोमों की संख्या पर उसका लिंग निर्भर करता है। क्रोमोसोमों की रचना को यदि अधिक शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी, जैसे इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखा जाए तो उसमें भी कुछ बहुत ही सूक्ष्म रचनाएँ दिखाई पड़ेगी। इनको जीन (Genes) कहा जाता है और यह विश्वास किया जाता है कि ये ही जनक के आनुवंशिक (hereditary) गुणों को उनकी संतानों तक पहुँचाते हैं। जंतुओं और वनस्पतियों के क्रोमोसोमों तथा जीनों को लेकर बहुत अधिक अनुसंधान और प्रयोग हुए हैं।
यह पाया गया है कि प्रत्येक प्राणी की जनन कोशिकाओं में पाए जानेवाले क्रोमोसोमों में कुछ ऐसे होते हैं, जिन्हें अलिंगसूत्र (Autosomes) कहते हैं। ये नर तथा मादा दोनों में एक प्रकार के ही होते हैं और सदा युग्म (pair) में रहते हैं। कुछ दूसरे प्रकार के क्रोमोसोम भी पाए जाते हैं, जिन्हें लिंग निर्धारक (Sex determiner) कहा जाता है। अब तक जितने प्रकार के क्रोमोसोम पाए गए हैं, उन्हें एक्स (X), वाई (Y), डब्ल्यू (W), ज़ेड (Z) तथा ओ (O) की संज्ञा दी गई है। माना जाता है कि नर तथा मादा का निर्धारण इन्हीं लिंगनिर्धारक क्रोमोसोमों की सम तथा विषम संख्या द्वारा होता है, जैसे मनुष्यों में लिंग का निर्धारण इस प्रकार होता है :
21 अलिंग सूत्र + 1 एक्स + 1 वाई = पुरुष; तथा
21 अलिंग सूत्र + 2 एक्स = स्त्री।
क्रोमोसोमों की संख्या के अनुसार नर तथा मादा को विषमयुग्मकी (heterogamous) या समयुग्मकी (homogamous) कहा जाता है। किसी प्राणी में नर समयुग्मकी होती है, तो किसी में मादा। पक्षियों, तितलियों, मछलियों, जलस्थलचर (amphibians) आदि में मादा विषमयुग्मकी होती है। इन प्राणियों में लिंगनिर्धारक क्रोमोसोमों को ज़ेड (Z) तथा डब्ल्यू (W) नाम दिया जाता है, जबकि अन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों में इन्हें एक्स (X) तथा वाई (Y) के नाम से संबोधित किया जाता है।

अनेक प्राणियों में एक्स तथा वाई ही नर या मादा लिंग का निर्धारण करते हैं। जब एक्स वाला शुक्राणु मादा के अंडे से संयुक्त होता है, तब युग्मनज को दो एक्स एक्स (XX) मिलते हैं और वह मादा बनता है। किंतु जब शुक्राणु का वाई मादा के अंडे के एक्स से संयुक्त होता है, तब युग्मनज को एक्स वाई, अर्थात् विषम संख्या प्राप्त होती है और वह नर होता है। मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के नर तथा मादा के क्रोमोसोमों में जो विभेद पाया जाता है, वह अगले पृष्ठ की सारणी में दिखाया गया है।
वनस्पतियों में क्रोमोसोम
जिस प्रकार जंतुओं में क्रोमोसोमों का अध्ययन किया गया है, उसी प्रकार वनस्पतियों में भी उनका अध्ययन किया गया है। अधिकतर बीज वाले पौधे उभयलिंगाश्रयी (monoecious) होते हैं, अर्थात् उनमें नर तथा मादा लिंग एक साथ होते हैं। क्रोमोसोमों की गणना होने पर भी लिंग की चर्चा केवल नर-मादा-विश्लेषण के ही सन्दर्भ में की जाती है, क्योंकि लिंग और आनुवंशिकता की समस्या वनस्पति जगत में नहीं है। कुछ जाति में नर तथा मादा पौधे पृथक् होते हैं। ऐसे पौधों के भी एक्स (X) तथा वाई (Y) क्रोमोसोमों का पता चला है, जैसे इलोडिया कैनाडेंसिस (Elodea canadensis), मिलैंड्रियम एल्बम (Milandrium album) आदि। बीजवाला एक पौधा, फ्रेगैरिया इलैटिऑर (Fragaria elatior), चिड़ियों की भाँति क्रोमोसोम वाला (abraxas type) बतलाया जाता है। कुछ अन्य पौधों में नर विषमलिंगी (heterogametic) होते हुए भी दो वाई (Y) तथा एक एक्स (X) धारण करता है। ह्रास विभाजन (meiosis) के समय दोनों वाई (Y) तथा एक्स (X) पृथक् हो जाते हैं और दो वाई (Y) जनन कोशिका से मिलकर नर तथा एक एक्स (X) मादा भ्रूण के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी प्रकार लिंग का निर्धारण अन्य पौधों में भी होता है।

हार्मोन सिद्धांत

प्राणियों के शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं जिन्हें वाहिनीहीन या अंत:स्रावी (Ductless, या Endocrine) कहा जाता है। कुछ विकसित विशेषकर कशेरुकी जंतुओं में इन ग्रंथियों के स्रावों का, जिन्हें हॉर्मोन कहते हैं, अध्ययन किया गया है। वनस्पतियों में भी हॉर्मोन होते हैं या नहीं, यह विवादग्रस्त विषय है। जंतुओं के शरीर में पाई जानेवाली ग्रंथियों के नाम हैं : पीयूष (Pituitary, या Hypophysio), पीनियल (Pineal), अवटुग्रंथि (Thyroid), पैराथाइरॉइड (Parathyroid), थाइमस (Thymus), पैक्रिअस या अग्न्याशय (Pancreas), वृक्क (Adrenal); जननग्रंथि (Gonads), नर में वृषण (Testis) तथा मादा में अंडाशय (Ovary)। इन ग्रंथियों से निकलने वाले हॉर्मोनों का अध्ययन विस्तार से किया गया है और यह पाया गया है कि नर प्राणी में पुरुषत्व (maleness) और मादा में स्त्रीत्व (femaleness) संबंधित गौण लैंगिक लक्षणों का अस्तित्व इन्हीं की क्रिया पर निर्भर करता है। जीन और क्रोमोसोम केवल यह निश्चित करते हैं कि युग्मनज नर होगा या मादा। वास्तविक पुरुषत्व और स्त्रीत्व का निर्धारण तथा उचित दिशा में उनका विकास वाहिनीहीन ग्रंथियों के स्रावों की सहायता से ही होता है। जैसे, कोई भ्रूण पुरुष के रूप में जन्म लेने वाला हो तो स्त्री हॉर्मोनों की सूई लगाकर अथवा उसे बधिया कर देने (castration) और उसके स्थान पर अंडाशय ग्रंथियों को आरोपित कर देने पर वह या तो पूर्णरूपेण स्त्री हो जाएगा, या उसमें स्त्रीत्व के लक्षण विकसित हा जाएँगे। ==
कुछ प्राणियों के नर तथा मादा क्रोमोसोमों की सारणी
नाम — नर—मादा
कछुआ — एक्स एक्स (XX) — एक्स ओ (XO)
कबूतर—एक्स एक्स, या जेड जेड (XX या ZZ) — एक्स ओ, या जेड डब्ल्यू (XO या ZW)
चमगादड़ — एक्स ओ (XO) — एक्स एक्स (XX)
चूहा — एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
चौपाए — एक्स ओ (XO) — एक्स एक्स (XX)
भेड़ — एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
चिंपैजी — एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
झींगुर, तेलचट्टा, टिड्डे — एक्स ओ, या एक्स वाई (XO या XY) — एक्स एक्स (XX)
सांड़ा — एक्स एक्स (XX) — एक्स ओ (XO)
मुर्गा– एक्स एक्स, या जेड जेड (XX या ZZ) — एक्स ओ या जेड डब्ल्यू (XO या ZW)
खरगोश — एक्स वाई, या एक्स ओ (XY या XO) — एक्स एक्स (XX)
कुत्ता — एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
भैंस — एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
घोड़ा — एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
बंदर—एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
ड्रोसोफिला (a) — एक्स वाई (XY) — एक्स एक्स (XX)
लिंग निर्धारण का संतुलन सिद्धांत
वनस्पतियों तथा जंतुओं का समुचित अध्ययन करने पर यह पाया गया है कि लिंग का निर्धारण नर और मादा प्रवृत्तियों का ही एकमात्र परिणाम नहीं होता। भ्रूण के विकास के साथ ही साथ नर और मादा निर्धारक तत्व भी समान रूप से ही विकसित होते हैं। कोई प्राणी नर या मादा केवल इसलिए नहीं हो जाता कि उसकी रचना विशेष संख्या वाले क्रोमोसोमों द्वारा हुई होती है, अपितु वह नर या मादा इसलिए भी हो जाता है कि उसने मादा या नर निर्धारक अन्य तत्वों को “दबा” (outweigh) दिया। सभी हॉर्मोनों का उत्पादन शरीर में होता रहता है, अत: जब स्त्रीत्व, या पुरुषत्व निर्धारक हॉर्मोन अधिक शक्तिशाली होंगे तब भ्रूण स्त्री, या पुरुष शरीर तथा प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर होगा। हॉर्मोनों के संतुलन का ही यह परिणाम होता है कि प्राणी नर या मादा के रूप में जन्म लेता है। कर्ट स्टर्न (Curt Stern) ने यह दिखलाया है कि यदि किसी स्त्री में दो एक्स के स्थान पर तीन एक्स हों, तो उसमें अपेक्षाकृत अधिक स्त्रीत्व होगा। किंतु ऐसी स्त्री देर में ऋतुवती, अत्यधिक अल्पायु और सर्वथा वंध्या होगी। इसी प्रकार गोल्डश्मिट (Goldschmidt) ने लिमैट्रिया जैपोनिका नामक (Lymantria japonica) शलभ (moth) का अध्ययन कर यह बतलाया है कि जब बलवान नरों का निर्बल कीटों से संयुग्मन होता है तब 50% सामान्य नर और 50% अंतलिंगी मादा (intersexed femal) की उत्पत्ति होती है। किंतु जब अत्यधिक सशक्त नरों का निर्बल मादाओं से संयोग होता है तब 100% नर कीट उत्पन्न होते हैं। प्रो॰ एफ.ए.ई. क्रिउ (F.A.E. Crew) भी कहते हैं कि भ्रूण के लिंग का निर्धारण केवल क्रोमोसोमों से ही न होकर, उनमें पाए जानेवाले जीनों (genes) की तथा अलिंगसूत्रों (autosomes) में पाए जाने वाले जनकों की अंतक्रिया (interaction) से भी होता है, जैसे पक्षियों में मादा विषमलिंगी एक्स वाई (XY) तथा नर समलिंगी एक्स एक्स (XX) होते हैं। कीटों में लैंगिक विभाजन जनन ग्रंथियों पर निर्भर नहीं करता। उनके मुख्य जनकात्मक लक्षण इस प्रकार होते हैं : नर एक्स ओ (XO), या एक्स वाई (XY); मादा (XX) एक्स एक्स। फिंकलर (Finkler) ने सन् 1923 में कुछ नर कीटों के मस्तक काटकर मादाओं पर तथा मादाओं के मस्तक नरों पर लगा दिए। इन प्रयोगों में यह पाया गया कि कीटों ने अपने शरीर के अनुसार नहीं अपितु मस्तक के अनुसार काम किया, अर्थात् नर मस्तक वाली मादाओं ने नर की भाँति तथा मादा मस्तकवाले नरों ने मादा की भाँति लैंगिक लक्षण प्रकट किए।

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