शम्सुद्दीन इल्तुतमिश मंगोलों से बचाव

शम्सुद्दीन इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत में शम्सी वंंश का एक प्रमुख शासक था। तुर्की-राज्य संस्थापक कुतुब-उद-दीन ऐबक के बाद वो उन शासकों में से था जिससे दिल्ली सल्तनत की नींव मजबूत हुई। वह ऐबक का दामाद भी था। उसने 1211 इस्वी से 1236 इस्वी तक शासन किया। राज्याभिषेक समय से ही अनेक तुर्क अमीर उसका विरोध कर रहे थे। खोखरों के विरुद्ध इल्तुतमिश की कार्य कुशलता से प्रभावित होकर मुहम्मद ग़ोरी ने उसे “अमीरूल उमरा” नामक महत्त्वपूर्ण पद दिया था। अकस्मात् मुत्यु के कारण कुतुबद्दीन ऐबक अपने किसी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर सका था। अतः लाहौर के तुर्क अधिकारियों ने कुतुबद्दीन ऐबक के विवादित पुत्र आरामशाह (जिसे इतिहासकार नहीं मानते) को लाहौर की गद्दी पर बैठाया, परन्तु दिल्ली के तुर्को सरदारों एवं नागरिकों के विरोध के फलस्वरूप कुतुबद्दीन ऐबक के दामाद इल्तुतमिश, जो उस समय बदायूँ का सूबेदार था, को दिल्ली आमंत्रित कर राज्यसिंहासन पर बैठाया गया। आरामशाह एवं इल्तुतमिश के बीच दिल्ली के निकट जड़ नामक स्थान पर संघर्ष हुआ, जिसमें आरामशाह को बन्दी बनाकर बाद में उसकी हत्या कर दी गयी और इस तरह ऐबक वंश के बाद इल्बारी वंश का शासन प्रारम्भ हुआ।

प्रतिद्वंदी

इल्तुतमिश के दो प्रमुख प्रतिद्वंदी थे – ताजु्ददीन यल्दौज तथा नासिरुद्दीन कुबाचा। ये दोनों गौरी के दास थे। यल्दौज दिल्ली के राज्य को ग़ज़नी का अंग भर मानता था और उसे गज़नी में मिलाने की भरपूर कोशिश करता रहता था जबकि ऐबक तथा उसके बाद इल्तुतमिश अपने आपको स्वतंत्र मानते थे। यल्दौज के साथ तराइन के मैदान में युद्ध किया जिसमें यल्दौज पराजित हुआ। उसकी हार के बाद गजनी के किसी शासक ने दिल्ली की सत्ता पर आपना दावा पेश नहीं किया।
कुबाचा ने पंजाब तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। सन् 1217 में उसने कुबाचा के विरूद्ध कूच किया। कुबाचा बिना युद्ध किये भाग गया। इल्तुतमिश उसका पीछा करते हुए मंसूरा नामक जगह पर पहुँचा जहाँ पर उसने कुबाचा को पराजित किया और लाहौर पर उसका कब्जा हो गया। पर सिंध, मुल्तान, उच्छ तथा सिन्ध सागर दोआब पर कुबाचा का नियंत्रण बना रहा।
इसी समय मंगोलों के आक्रमण के कारण इल्तुतमिश का ध्यान कुबाचा पर से तत्काल हट गया पर बाद में कुबाचा को एक युद्ध में उसने परास्त किया जिसके फलस्वरूप कुबाचा सिंधु नदी में डूब कर मर गया। चंगेज खाँ के आक्रमण के बाद उसने पूर्व की ओर ध्यान दिया और बिहार तथा बंगाल को अपने अधीन एक बार फिर से कर लिया।
वह एक कुशल शासक होने के अलावा कला तथा विद्या का प्रेमी भी था।

कठिनाइयों से सामना
सुल्तान का पद प्राप्त करने के बाद इल्तुतमिश को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसकी प्रारम्भिक कठानाई अनेक गद्दी के दावेदारों का होना था। जिनका बाद में ‘कुल्बी’ अर्थात कुतुबद्दीन ऐबक के समय सरदार तथा ‘मुइज्जी’ अर्थात् मुहम्मद ग़ोरी के समय के सरदारों के विद्रोह का दमन किया। इल्तुमिश ने इन विद्रोही सरदारों पर विश्वास न करते हुए अपने 40 ग़ुलाम सरदारों का एक गुट या संगठन बनाया, जिसे ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी’ का नाम दिया गया। इस संगठन को ‘चरगान’ भी कहा जाता है। इल्तुतिमिश के समय में ही अवध में पिर्थू विद्रोह हुआ।
1215 से 1217 ई. के बीच इल्तुतिमिश को अपने दो प्रबल प्रतिद्वन्द्धी ‘एल्दौज’ और ‘नासिरुद्दीन क़बाचा’ से संघर्ष करना पड़ा। 1215 ई. में इल्तुतिमिश ने एल्दौज को 644759062में पराजित किया। 1217 ई. में इल्तुतिमिश ने कुबाचा से लाहौर छीन लिया तथा 1228 में उच्छ पर अधिकार कर कुबाचा से बिना शर्त आत्मसमर्पण के लिए कहा। अन्त में कुबाचा ने सिन्धु नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस तरह इन दोनों प्रबल विरोधियों का अन्त हुआ।
मंगोलों से बचाव
मंगोल आक्रमणकारी चंगेज़ ख़ाँ की बेटी से से जलालुद्दीन मुगबर्नी का प्रेमप्रसंग था जिसके के भय से भयभीत होकर ख्वारिज्म शाह का पुत्र ‘जलालुद्दीन मुगबर्नी’ वहां से भाग कर पंजाब की ओर आ गया। चंगेज़ ख़ाँ उसका पीछा करता हुए लगभग 1220-21 ई. में सिंध तक आ गया। उसने इल्तुतमिश को संदेश दिया कि वह मंगबर्नी की मदद न करें। यह संदेश लेकर चंगेज़ ख़ाँ का दूत इल्तुतमिश के दरबार में आया। इल्तुतमिश ने मंगोल जैसे शक्तिशाली आक्रमणकारी से बचने के लिए मंगबर्नी की कोई सहायता नहीं की। मंगोल आक्रमण का भय 1228 ई. में मंगबर्नी के भारत से वापस जाने पर टल गया। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद अली मर्दान ने बंगाल में अपने को स्वतन्त्र घोषित कर लिया तथा ‘अलाउद्दीन’ की उपाधि ग्रहण की। दो वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उसका पुत्र ‘हिसामुद्दीन इवाज’ उत्तराधिकारी बना। उसने ‘ग़यासुद्दीन आजिम’ की उपाधि ग्रहण की तथा अपने नाम के सिक्के चलाए और खुतबा (उपदेश या प्रशंसात्मक रचना) पढ़वाया।

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