बच्चों से सम्बन्धित विशिष्ट नीतियाँ

बच्चे समाज के सबसे तबके में शामिल होते हैं, और राष्ट्र सबसे महत्वपूर्ण सम्पत्ति समझे जाते हैं। विशेष तौर पर वंचित बच्चों के लिए बने सुरक्षा और विकास कार्यक्रमों को सभी बच्चों के लिए एक समान अवसर सुनिश्चित करना चाहिए ताकि उनका सर्वोकृष्ट व्यक्तिगत विकास हो सके। इस लेख में बच्चों से सम्बन्धित राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय नीतियाँ, कार्यक्रम व कन्वेंशन की चर्चा है।
भारत के संविधान में संबंधित अनुच्छेद
अनुच्छेद 14,15, 15,(3), 19(1)(ए), 21, 21 (ए), 23 (1), 24, 39(इ), 39 (एफ), और 45 में राष्ट्र के बच्चों के कल्याण और विकास से सीधा और प्रभाव है।
बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीति
1974 में भारत सरकार द्वारा घोषित किया गया।
यह सुनिश्चित करना कि बच्चों के कार्यक्रम मानव संसाधन विकास को राष्ट्रीय योजनाओं में बच्चों के कार्य कम सम्मिलित हो, सुनिश्चित करना।
समाज के कमजोर वर्गों के बच्चों पर विशेष रूप से जोर देते हुए, स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा एवं मनोरंजन के क्षेत्र में प्रभावकारी सेवा सुनिश्चित करना।
इन सेवाओं को संगठित करने के लिए, पारिवारिक बंधन को जोड़ने की दिशा में प्रयास हो, ताकि बच्चों के विकास की पूरी क्षमता एक सामान्य परिवार और सामुदायिक माहौल के भीतर सुनिश्चित की जा सके।
बच्चों के लिए बनी राष्ट्रीय कार्य योजना
बच्चों के प्रति एक वचनबद्धता नाम से भारत सरकार द्वारा तैयार गया।
राष्ट्रिय कार्य योजना ने चूँकि असुरक्षित बच्चों के विभिन्न लक्षित समूहों को चिन्हित किया और उनके लिए बेहतर सुरक्षा के निर्देश दिए इसलिए देखरेख व सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के लिए यह विशिष्ट महत्व का हैं।
यह योजना अंतर क्षेत्रों, अंतर विभागों के समन्वय व पोषण, पानी और निकासी, शिक्षा, देखरेख व सुरक्षा की जरूरत वाले बच्चे, बालिकाएं, किशोरी बच्चे और पर्यावरण, महिला, वकालत, लोकभागीदारी, संसाधन संचालन व मूल्यांकन के क्षेत्रों को प्राप्त करने का परिणाम था।
बालिकाओं के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना
भारत सरकार ने 1991-2000 को अवधि के लिए बालिकाएं के लिए एक अलग से योजना बनाई, तीन महत्वपूर्ण लक्ष्य इस प्रकार थे:-
बालिकाओं के लिए जीने का अधिकार और सुरक्षा तथा सुरक्षित मातृत्व।
बालिकाओं का सर्वंगीण विकास
असुरक्षित बालिकाओं एवं देखरेख एवं संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों को विशेष संरक्षण।
बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन
संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार आयोग द्वारा बाल अधिकार कन्वेंशन का मसौदा तैयार किया गया जिसे 20 नवंबर 1989 को संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा अंगीकृत किया गया।
बच्चों के लिए चल रहे अन्तर्राष्ट्रीय आन्दोलन में बाल अधिकार कन्वेंशन ने एक निर्णायक मोड़ दिया।
बाल अधिकार कन्वेंशन का सार्वभौमिक सिद्धांत है बच्चे का सर्वोत्तम हित और बच्चों को सबसे जरुरी आवश्यकताओं के लिए संसाधन के आबंटन में हुए सर्वोपरि प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बाल अधिकार कन्वेंशन बच्चों को उनके बुनियादी मानव अधिकार देता है जैसे: नागरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनितिक अधिकार ताकि बच्चे अपनी पूर्ण क्षमताओं के प्राप्त कर सकें।
बाल अधिकार कन्वेंशन प्रक्रिया सरकारों के द्वारा अधिकारिक स्वीकृति से मजबूती ग्रहण करती है। जिसका अर्थ है कि सरकारें इसके सिद्धांतों को मानती है और बच्चों के मामले निपटाने के लिए निश्चित मानकों को लागू करने के लिए वचनबद्ध है। ये अधिकार चार प्रमुख क्षेत्रों जीवन का अधिकार, विकास, सुरक्षा और सहभागिता को शामिल करती है।
जीवन जीने का अधिकार
जीवन जीने का अधिकार, एक बच्चे के जीवन और उसकी सबसे बुनियादी आवश्यकताओं जिसमें एक संतोष प्रद जीवन स्तर, आश्रय, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सम्मलित है, के अधिकार को शामिल करता है।
विकास का अधिकार
उन तमाम अधिकारों को शामिल करता है, जिनकी एक बच्चे को अपनी पूर्ण क्षमताओं को प्राप्त करने के लिए जरूरत है, जैसे शिक्षा का अधिकार, खेल और अवकाश, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, सूचना का अवसर, सोचने की स्वतंत्रता, चेतना और धर्म।
सुरक्षा का अधिकार
मांग करता है कि बच्चे हर तरह के उपेक्षा और शोषण से सुरक्षित हो और शरणार्थी हुए बच्चे के लिए विशेष देखरेख, दांडिक न्याय प्रणाली में बच्चों के उत्पीड़न, सशक्त संघर्ष में लिप्तता, बाल मजदूरी, ड्रग उत्पीड़न, एवं शोषण के खिलाफ सुरक्षा हो।
सहभागिता का अधिकार
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लिए लिए हुए राष्ट्रीय और समुदायों में बच्चों की सक्रिय भूमिका बच्चों के अपने जीवन से जुड़े मामलें में दखल और संगठनों में उनके शांतिपूर्ण सहभागिता को मजबूत करता है।
भारत ने 11 दिसम्बर 1992 को कन्वेंशन का अनुसमर्थन किया और इसके द्वारा भारत ने बच्चों के प्रति अपने उद्देश्यों की प्रतिबद्धता दिखाई।
अधिकारों को पूरी तरह तीन शब्दों में संक्षेपित किया जा सकता है: प्रावधान, सुरक्षा और सहभागिता। बच्चों को कुछ विशेष सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार है जिसमें नाम, राष्ट्रीयता, स्वास्थ्य देखरेख एवं शिक्षा शामिल है। कुछ खास क्रियाओं जैसे प्रताड़ना, शोषण, उत्पीड़न, असंगत सजा एवं बिना अधिकार माता-पिता की देखरेख से हटाये जाने से सुरक्षित होने तथा उनके जीवन पर प्रभाव डालने वाले फैसलों में भागीदार होने का अधिकार बच्चों को है। बाल अधिकार अधिकार कन्वेंशन बच्चों को उनके बुनियादी मानव व राजनैतिक अधिकार देता है जिससे वे अपनी पूरी क्षमता को उजागार करने में सक्षम हो सकें। बाल अधिकार कन्वेंशन बच्चों को प्राथमिकता के सिद्धांत से संचालित होता है, एक ऐसा सिद्धांत जो यह कहता है कि किसी भी हाल में बच्चों की प्राथमिक जरूरतों को संसाधनों के आबंटन में प्राथमिकता की जाए।

कन्वेंशन में चार प्रमुख सिद्धांत
कन्वेंशन में चार प्रमुख सिद्धांत शामिल है। ये सिद्धांत इसलिए हैं कि कन्वेंशन को समझने और उसके हिसाब से राष्ट्रीय कार्यक्रम निर्धारित करने में मदद मोले। ये सिद्धांत, खास तौर पर, अनुच्छेद 2,3,6, एवं 12 में परिभाषित है ये है: –
गैर-भेदभाव (अनुच्छेद 2):
सरकारों को यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उनके अधिकार क्षेत्र से सभी बच्चे अपने अधिकारों का लाभ उठा सकें। सबसे जरुरी संदेश है मिलने वाले मौके में समानता का लड़कियों को लड़के के बराबर मौके दिए जाने चाहिए। शरणार्थी बच्चों, विदेशी मूल के बच्चों, आदिवासी व अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को बाकी बच्चों के समान अधिकार मिलने चाहिए, विकलांगता से ग्रस्त बच्चों को सही जीवनस्तर जीने के समान मौके मिलने चाहिए।
बच्चे का सर्वोपरि हित (अनुच्छेद 3):
जब सरकारी प्राधिकारी बच्चों पर प्रभाव डालने वाला कोई भी फैसला लें तो बच्चों, सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखने वाली पहली बात यह होनी चाहिए कि यह सिद्धांत अदालती फैसलों, वैधानिक अंगों, प्रशासकीय प्राधिकरणों और सार्वजनिक व निजी दोनों प्रकार के समाजिक कल्याण संस्थाओं के फैसलों पर लागू होता है।
जीवन जीने, पनपने व विकास अधिकार (अनुच्छेद 6):
विकास को इस सन्दर्भ में व्यापक अर्थों में लिया जाना चाहिए जिसमें गुणात्मक आयाम भी जोड़ना चाहिए न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक, भावनात्मक, शिक्षा सम्बन्धी, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास।
बच्चे का मत (अनुच्छेद 12):
बच्चों का अधिकार गंभीरता से लिया जाए, जिसमें कोई भी कानूनी या प्रशासकीय प्रक्रिया शामिल है।

Leave a Comment