तापमान पर्यवेक्षण और प्रातिनिधिक जलवायु आँकड़े

पृथवी के सतह पर विभिन्न स्थानों पर सीधे तौर पर यंत्रों द्वारा मापे गए तापमान के अतिरिक्त रेडियोसोन्ड गुब्बारों द्वारा मापे गए ऊँचाई पर वायुमण्डलीय ताप दशाओं के आँकड़े भी बीसवीं सदी के मध्य के बाद मौजूद हैं। साथ ही सत्तर के दशक के बाद से उपग्रहीय आँकड़े भी उपलब्ध हैं। 18O/16O अनुपातों सम्बन्धी पर्यवेक्षण द्वारा प्राप्त आंकड़ों का प्रयोग भी पुराने दौर की जलवायु को कल्पित करने में सहायक हैं। पृथ्वी पर जमी बर्फ़ के नमूनों में कैद ऑक्सीजन में ऑक्सीजन-18 और ऑक्सीजन-16 के अनुपात उस समय के समुद्री सतह के तापमान के बारे में बताते हैं जब यह जल वाष्पीकृत हुआ होगा, क्योंकि प्रत्येक ताप दशा के लिए इनका एक विशिष्ठ अनुपात होता है। यह तरीका प्रातिनिधिक (प्रॉक्सी) जलवायु आँकड़े प्रदान करने वाली कई विधियों में सर्वप्रमुख है।
ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य
हाल के इतिहास में जलवायु बदलाव को चिह्नित करने के लिए बस्तियों और कृषि प्रतिरूपों में संगत बदलाव का अध्ययन किया जाता है। पुरातात्विक साक्ष्य, मौखिक इतिहास और ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन पुराने समय की जलवायु को पुनःकल्पित करने में सहायक हैं। जलवायु दशाओं में परिवर्तन को कई सभ्यताओं के पतन के कारण के रूप में भी चिह्नित किया जाता रहा है।
हिमनद
हिमनदों को जलवायु में बदलाव के संकेतकों में सर्वथा सम्वेदनशील संकेतक के रूप में देखा जाता है। हिमनदों का आकार इनके ऊपरी हिस्से में बर्फ़बारी के कारण होने वाले बर्फ़ के आगम और निचले सिरे पर बर्फ़ के पिघलने के बीच के संतुलन पर आधारित होता है, जिसे हिमनद का द्रव्यमान संतुलन भी कहा जाता है। तापमान के अधिक होने की दशा में हिमनदों का यह द्रव्यमान संतुलन ऋणात्मक हो जाता है, अर्थात हिमपात से जितनी बर्फ़ का आगम होता है उससे ज़्यादा बर्फ़ निचले हिस्सों में पिघलने लगती है और परिणामस्वरूप हिमनद पीछे की ओर खिसकने लगता है जिसे हिमनद निवर्तन कहा जाता है। इसके विपरीत तापमान में कमी आने पर हिमनद की लम्बाई बढ़ती है।
उपरोक्त सामान्य कारण के अलावा, हिमनदों की लम्बाई में होने वाले परिवर्तन अन्य कई प्राकृतिक प्रक्रियाओं और बाह्य दशाओं पर निर्भर करते हैं। इसी कारण, तापमान, वर्षण, हिमनदीय और उपहिमनदीय जलविज्ञान के तत्व मिलकर किसी एक ऋतु में भी हिमनद की लम्बाई को विविध तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि हिमनदों की लम्बाई के आधार पर जलवायु के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए एक पर्याप्त समयावधि के आंकड़ों का औसत निकाल कर ही इनके आकार में होने वाले बदलाव की प्रवृत्ति देखी जाती है, ताकि लघु-समयावधि के विचलनों के प्रभाव को हटा कर केवल जलवायु के कारण हुए बदलाव को अलग से चिह्नित किया जा सके।
1970 के दशक से ही विश्व के हिमनदों की आँकड़ासूची तैयार की जाती रही है, जो मुख्यतः हवाई छायाचित्रों और इनके मानचित्रण पर आधारित है, तथापि अब यह उपग्रह आंकड़ों पर काफ़ी निर्भर हो चली है। इस आँकड़ा संग्रहण के कार्य के अन्तर्गत लगभग 24,00,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर फैले 10,00,000 से भी अधिक हिमनदों की मॉनिटरिंग की जा रही है और प्राथमिक प्राक्कलनों के मुताबिक पृथ्वी पर कुल हिमाच्छादित क्षेत्र 4,45,000 वर्ग किलोमीटर है। हिमनद निवर्तन और हिमनद द्रव्यमान संतुलन सम्बन्धी आँकड़े वल्ड ग्लेशियर मॉनिटरिंग सर्विस (विश्व हिमनद अनुवीक्षण सेवा) द्वारा वार्षिक रूप से एकत्र किये जाते हैं। इन आँकड़ों के अध्ययन से यह पता चलता है कि वैश्विक रूप से हिमनदों में सिकुड़ाव हो रहा है। इन प्रतिरूपों में, अलग-अलग समयावधियों में हिमनदों के प्रतिरूप मिले हैं, चालीस के दशक में इनके सिकुड़ने के मजबूत प्रमाण मिले हैं, जबकि बीस और सत्तर के दशकों में इनमें स्थायित्व अथवा विस्तार दर्ज किया गया और अस्सी के दशक के मध्य से वर्तमान तक इनमें पुनः व्यापक सिकुड़ाव देखा जा रहा है।
वास्तव में प्लायोसीन के बाद के काल से ही हिमनदों के फैलाव में उठते-गिरते प्रतिरूप दिखाई पड़ते हैं और हिमनद युग (ग्लेशियल पीरियड) और आन्तरा-हिमनदीय युग (इंटर-ग्लेशियल पीरियड) का आवागमन लगा रहा है। वर्तमान अन्तरा-हिमनद युग (होलोसीन) तकरीबन 11,700 वर्षों से जारी रहा है। भूवैज्ञानिक इतिहास के इन युगों में कक्षीय विचलनों के कारण हिमनदों के फैलाव क्षेत्र में यह चक्रीय विषमता देखने को मिलती है, हालाँकि, कुछ ऐसी प्रक्रियाओं का पता भी चलता है जिनके कारण बिना कक्षीय विचलनों के भी जलवायु में परिवर्तन संभव होने के प्रमाण मिले हैं।
हिमनदों द्वारा, इनके निवर्तन (पीछे लौटने) के बाद छोड़े गए पदार्थों से मोरेन का निर्माण होता है। इन मोरेन निक्षेपों में विविध प्रकार के पदार्थ होते हैं जिनके अध्ययन से ग्लेशियरों के निवर्तन के समय के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।
आर्कटिक समुद्री हिम का क्षय
पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों में जमा बर्फ़ के विस्तार और मोटाई के आँकड़ें भी यह प्रमाणित करते हैं कि पिछले कुछ दशकों में पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन आया है। आर्कटिक सागर में जमी बर्फ़ समुद्री खारा जल है जो जमी हुई अवस्था में है और समुद्र में तैरता रहता है, इसमें ऋतुओं के साथ बदलाव आता है और इसकी मोटाई और फैलाव बदलता रहता है। उत्तरी ध्रुव के पास, आर्कटिक सागर में हर वर्ष कुछ मात्र में बर्फ़ स्थाई रूप से रहती है और गर्मियों में भी यह चादर पूरी तरह पिघल कर समाप्त नहीं होती, जबकि दक्षिणी महासागर में (अंटार्कटिका के चारों ओर) यह हर साल पूरी तरह समाप्त हो जाती है, और जाड़ों में पुनः बनती है। उपग्रह से प्राप्त आँकड़े यह बताते हैं कि उत्तरी ध्रुव की समुद्री हिमचादर 1981-2010 के औसत की तुलना में, वर्तमान में प्रतिदशक लगभग 13.3% की दर से घट रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले वर्ष इस चादर अभूतपूर्व पिघलाव दर्ज किया गया।

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