ऐसे करे मूंग की खेती

बुवाई का समय

मूंग की बुवाई के लिए उपयुक्त समय 10 मार्च से 10 अप्रैल तक है। बुवाई में देर करने से फल एवं फलिया गर्म हवा के कारण तथा वर्षा होने से क्षति हो सकती है। तराई क्षेत्र मे मूंग की बुवाई मार्च के अन्दर कर लेनी चाहियें। अप्रैल माह में शीघ्र पकने वाली प्रजातियां ही बोई जाये। बसंत कालीन प्रजातियों की बुवाई 15 फरवरी से 10 मार्च तक तथा ग्रीष्म कालीन प्रजातियों के लिये 10 मार्च से 10 अप्रैल का समय उपयुक्त होता है। जहाँ बुवार्इ अप्रैल के प्रथम सप्ताह के आसपास हो वहॉ प्रजाति पंत-2, मेहा एवं एच०यू०एम०-16 की बुवाई की जाये।

बीज दर

20-25 कि०ग्रा० स्वस्थ बीज प्रति हेक्टर पर्याप्त होता है।

बीज शोधन

2.5 ग्राम थीरम अथवा 2.5 ग्राम थीरम एवं एक ग्राम कार्बेन्डाजिम या 5-10 ग्राम ट्राइकोडर्मां प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधन करें। बीज शोधन से रोग शोधन होता है। इससे जमाव अच्छा हो जाता है, फलस्वरूप प्रति इकाई पौधों की संख्या सुनिश्चित हो जाती है और उपज में वृद्धि हो जाती है।

बीज उपचार

उपर्युक्त बीज शोधन करने के पश्चात बीजों को एक बोरे पर फैलाकर, मूँग के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें जिसकी विधि निम्न प्रकार है

आधा लीटर पानी में 250 ग्राम गुड़ एवं 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर का पूरा पैकेट मिला दें। इस मिश्रण को 10 किग्रा० बीज के ऊपर छिड़क कर हल्के हाथ से मिलायें जिससे बीज के ऊपर एक हल्की पर्त बन जाती है। इस बीज को छाये में 1-2 घन्टे सुखाकर बुवाई प्रातः 9 बजे तक या सांयकाल 4 बजे के बाद करें। तेज धूप में कल्चर के जीवाणुओं के मरने की आशंका रहती है। ऐसे खेतों में जहां मूंग की खेती पहली बार अथवा काफी समय के बाद की जा रही हो, वहां कल्चर का प्रयोग अवश्य करें।

पी.एस.बी.

दलहनी फसलों के लियें फास्फेट पोषक तत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है। रासायनिक उर्वरकों से दिये जाने वाले फास्फेट पोषक तत्व का काफी भाग भूमि में अनुपलब्ध अवस्था में परिवर्तन हो जाता है। फलस्वरूप फास्फेट की उपलब्धता में कमी को कारण इन फसलों की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। भूमि में अनुपलब्ध फास्फेट को उपलब्ध दशा में परिवर्तित करने में फास्फेट सालूब्लाइंजिंग बैक्टिरियां (पी.एस.बी.) का कल्चर बहुत ही सहायक होता है। इसलियें आवश्यक है कि नत्रजन की पूर्ति हेतु राइजोबियम कल्चर के साथ साथ फास्फेट की उपलब्धता बढ़ाने के लिये पी.एस.बी. का भी प्रयोग किया जाय। पी.एस.बी. प्रयोग विधि एवं मात्रा राइजोबियम कल्चर के समान ही है।

बुवाई की विधि

मूंग की बुवाई देशी हल के पीछे कूंडो मे 4-5 सेमी. की गहराई पर करें और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25-30 सेमी. रखनी चाहिये।

उर्वरक की मात्रा

सामान्यतः उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के अनुसार किया जाना चाहियें अथवा उर्वरक की मात्रा निम्नानुसार निर्धारित की जायें।

10-15 किलो नत्रजन 40 किग्रा० फास्फोरस 20 किग्रा० पोटाश एवं 20 किग्रा० सल्फर प्रति हेक्टर प्रयोग करें। फास्फोरस के प्रयोग से मूंग की उपज में विशेष वृद्धि होती है। उर्वरकों की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय कूड़ों में बीज से 2-3 सेमी० नीचे देना चाहिए। यदि सुपर फास्फेट उपलब्ध न हो तो 1 कुन्तल डी०ए०पी० तथा 2 कुन्तल जिप्सम का प्रयोग बुवाई के साथ किया जाये। यदि राइजोबियम कल्चर का प्रयोग मृदा में करना हो तो उसके लिये मृदा में नमी की उचित मात्रा आवश्यक है। इसके लिये बलुअर दोमट मृदा है और कार्बनिक पदार्थ कम है तो 4-5 किग्रा० राइजोबियम कल्चर प्रति हे० के हिसाब से उचित मात्रा में मिलाना चाहिए। परन्तु यदि दोमट मृदा है और मृदा में कार्बनिक पदार्थ अधिक है तो उचित नमी की दशा में केवल 2.5 किग्रा० राइजोबियम कल्चर ही मृदा में मिलाने के लिए पर्याप्त है।

सिंचाई

मूंग की सिंचाई भूमि की किस्म तापमान तथा हवाओं की तीव्रता पर निर्भर करती है। आमतौर पर मूंग की फसल को 3-4 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। पहली सिंचाई बुवाई के 25-30 दिन बाद और फिर बाद में 10-15 दिन के अन्तर से आवश्यकतानुसार सिंचाई की जाये। पहली सिंचाई बहुत जल्दी करने से जड़ों तथा ग्रन्थियों के विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। फूल आने से पहले तथा दाना पडते समय सिंचाई आवश्यक हैं । सिंचाई क्यारी बनाकर करना चाहियें। जहॉ स्प्रिंकलर हो वहां इसका प्रयोग उत्तम जल प्रबन्ध हेतु किया जायें।

खरपतवार नियंत्रण

पहली सिंचाई के बाद निकाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ भूमि से वायु का भी संचार होता है जो उस समय मूल ग्रन्थियों में क्रियाशील जीवाणुओं द्वारा वायु मण्डलीय नत्रजन एकत्रित करने में सहायक होता है। खरपतवारों का रासायनिक नियंत्रण पैन्डीमैथलीन 30 ई०सी० के 3.3 लीटर को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के दो तीन दिन के अन्दर छिड़काव करें। खरपतवार नियंत्रण हेतु पंक्तियों में बोई गई फसल में वीडर का प्रयोग आर्थिक दृष्टि से लाभकारी होगा।

फसल सुरक्षा

पीले चित्रवर्ण : मूंग में प्रायः पीले चित्रवर्ण (मोजैक) रोग का प्रकोप होता है। इस रोग के विषाणु सफेद मक्खी द्वारा फैलते हैं।

नियंत्रण

समय से बुवाई करनी चाहियें।पीले चित्र वर्ण (मोजैक) से अवरोधी⁄सहष्णिु प्रजातियाँ पंत मूँग-4, पी०डी०एम०-139, एच०यू०एम०-16 की बुवाई करनी चाहिए।चित्रवर्ण (मोजैक) प्रकोपित पौधे दिखते ही सावधानी पूर्वक उखाड़ कर नष्ट कर जलाकर या गड्ढ़े में गाड़ देना चाहिए।इमिडाक्लोरोपिड 250 मिली० को प्रति हे० 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।5 से 10 प्रौढ़ मक्खी (सफेद मक्खी) प्रति पौध की दर से दिखाई पड़ने पर मिथाइल ओ-डिमेटान 25% ई०सी० या डाईमेथोयेट 30 ई०सी० 1 लीटर प्रति हे० की दर से छिड़काव करना चाहिए।

थिप्स

इस कीट के शिशु एंव प्रौढ़ पत्तियों एंव फूलों से रस चूसते है। भारी प्रकोप होने पर पत्तियों से रस चूसने के कारण वे मुड़ जाती है।तथा फूल गिर जाते है जिससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

नियंत्रण

फोरेट-10 जी को 10 किग्रा० अथवा कार्बोफ्यूरान-3 जी को 20 किग्रा०⁄हे० की दर से बुआई के समय प्रयोग करना चाहिए।मिथाइल-ओ-डिमेटान 25% ई०सी० या डायमिथोएट 30% ई०सी० 1 लीटर की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

हरे फुदके

इस कीट के प्रौढ़ एवं शिशु दोनो पत्तियों से रस चूस कर उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है।

नियंत्रण

थिप्स के लिये बतायें गये कीटनाशकों के प्रयोग से हरे फुदके का नियंन्त्रण किया जा सकता है।

फली वेधक

किन्ही-किन्ही वर्षों में फली वेधकों से फसल को काफी हानि होती है। यदि 2 कैटरपिलर प्रति वर्ग मीटर हो तो इनके नियंत्रण के लिए इन्डोक्साकार्ब 15.8% ई०सी० 500 मिली० या क्यूनालफास 25% ई०सी०1.25 लीटर प्रति हे० की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

भण्डारण

भण्डारण में रखने से पूर्व इनकों अच्छी तरह साफ करके सुखा लेना चाहियें इसमें 10 प्रतिशत से अधिक नमी नही होनी चाहियें। मूंग के भण्डारण हेतु स्टोरेज विनस का प्रयोग उपयुक्त होता है।

भण्डारण गृह एवं कोठियों आदि का भण्डारण से कम से कम दो सप्ताह पूर्व खाली करके उनकी सफाई मरम्मत व चूने से पुताई कर देनी चाहियें। 1% मैलाथियान 50% ई०सी० का घेाल तथा पानी अथवा 0-66% डाइक्लोरोवास से 76% ई०सी० का घोल को प्रति 100 वर्गमीटर की दर से गोदाम के फर्श तथा दीवारों पर छिड़कना चाहिए। वर्षा ऋतु में एक या दो बार मौसम साफ रहने पर निरीक्षण करना चाहिए और आवश्यकतानुसार धूमीकरण पुनः कर देना चाहिए।सूखी नीम की पत्ती के साथ भण्डारण करने पर कीड़ो से सुरक्षा की जा सकती है।

प्रभावी बिंदु

बुवाई के समय उपयुक्त नमी पर 25 फरवरी से 10 अप्रैल तक मूंग की बुवाई करें। तराई क्षेत्र में मार्च में बुवाई करें।सिगल सुपर फास्फेट का प्रयोग बेसल डेसिंग में अधिक लाभदायक रहता है।मौजेक से बचाव के लिए समय से बुवाई को प्राथमिकता दें।प्रथम तुड़ाई समय पर करें।पहली सिंचाई 30-35 दिन पर करें।बीजोपचार राइजोबियम कल्चर तथा पी०एस०बी० से अवश्य किया जाये।अप्रैल के प्रथम सप्ताह में बुवाई हेतु सम्राट, मेहा, एच०यू०एम० 16 व पंत मूंग-2 का प्रयोग करें।35-40 दिन की फसल होने पर थ्रिप्स की निगरानी रखे तथा प्रकोप प्रारम्भ होते ही उपयुक्त कीटनाशी रसायन का छिड़काव करें।
स्रोत- कृषि विभाग उत्तर प्रदेश

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