कीट नियंत्रण के प्रकार भाग – 2

जीवाणुमुक्‍त बनाना
1970 के दशक की शुरुआत में U-5897 (3-क्लोरो-1, 2-प्रोपेनेडियोल) के साथ प्रयोगशाला अध्ययन किये गए थे जो असफल साबित हुए थे। जीवाणुनाशन चारे पर शोध जारी है।
सॉइल स्टीमिंग भूमि को जीवाणु मुक्त बनाने का एक अन्य प्रभावी तरीका है। इसके तहत मिटटी में गर्म भाप को डालकर कीटों का सफाया किया जाता है।
संक्रमित पौधों का विनाश
यदि कीटों की प्रजातियों के प्रसार को रोकने के लिए आवश्यक समझा जाए, तो वन सेवाओं के अधिकारी कभी कभी संक्रमित क्षेत्र के सभी वृक्षों को नष्ट कर देते हैं। कुछ कीटों से संक्रमित खेतों को पूरी तरह जला दिया जाता है, ताकि कीटों के प्रसार को प्रभावी रूप से रोका जा सके.
प्राकृतिक कृंतक नियंत्रण
कई वन्यजीव पुनर्वास संगठन कृंतक नियंत्रण के प्राकृतिक तरीकों को बढ़ावा देते हैं, जिसमें अपवर्जन तथा परभक्षियों की सहायता लेना शामिल होता है और जिससे द्वितीयक विषाक्तता को पूर्णतया रोकने में मदद मिलती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका पर्यावरण संरक्षण एजेंसी इससे सहमत है; नौ प्रकार के कृंतकों के जोखिम को कम करने के लिए उसके द्वारा प्रस्तावित निर्णय में कहा गया है कि, “निवास स्थानों में ऐसे संशोधन किये बिना जिनके द्वारा उन क्षेत्रों को कृंतकों के लिए कम आकर्षित बनाया जा सके, कृंतकों का उन्मूलन भी उनकी नयी आबादी को उस क्षेत्र में पुनः बसने से रोकने में नाकामयाब ही रहेगा.”

निरोधक

एबीस बलसामिया वृक्ष से प्राप्त होने वाला बलसाम फर तेल, एक इपीए द्वारा अनुमोदित गैर विषाक्त कृंतक निरोधक है।
एकासिया पॉलीएकान्था सब्स्प. केम्पाईलेका (Acacia polyacantha subsp. campylacantha) न्था की जड़ से निकलने वाले रासायनिक यौगिक मगरमच्छ, सांप तथा चूहों जैसे जानवरों को दूर रखने में मदद करते हैं। सल, नहीरासायनिक कीटनाशक का प्रयोग ये सूक्ष्मजीव बचा फसल में कीटों से बचाव के लिए किसान रासायनिक कीटनाशी का छिड़काव करते हैं, जो वातावरण और इंसानों के लिए खतरनाक होते है। साथ ही धीरे-धीरे इन कीटनाशकों का असर भी कम होने लगा है। ऐसे में किसान हानिकारक कीटों से बचाव के लिए सूक्ष्म जैविक प्रबंधन कर सकते हैं। सूक्ष्म जैविक कीट प्रबंधन एक प्राकृतिक पारिस्थितिक घटना चक्र है, जिसमे नाशीजीवों के प्रबंधन में सफलतापूर्वक प्रयोग में लाया जा सकता है और यह एक संतुलित, स्थाई और किफायती कीट प्रबंधन का साधन हो सकता है। सूक्ष्म जीवियों से नाशीजीवों का नियंत्रण सूक्ष्म-जैविक प्रबंधन कहलाता है। यह जैविक प्रबंधन का नया पहलू है, जिसमें नाशीजीवों के रोगाणुओं का उपयोग उनके नियंत्रण के लिए किया जाता है। केंद्रीय नाशीजीवी प्रबंधन संस्थान के कृषि विशेषज्ञ राजीव कुमार बता रहे हैं कैसे ये मददगार साबित हो सकते हैं। प्रकृति में बहुत से ऐसे सूक्ष्मजीव हैं, जैसे विषाणु, जीवाणु व फफूंद आदि जो शत्रु कीटों में रोग उत्पन्न कर उन्हें नष्ट कर देते हैं, इन्ही विषाणु, जीवाणु और फफूंद आदि को वैज्ञानिकों ने पहचान कर प्रयोगशाला में इन का बहुगुणन किया और प्रयोग के लिए उपलब्ध करा रहे है, जिनका प्रयोग कर किसान लाभ ले सकते हैं। जीवाणु (बैक्टीरिया) मित्र जीवाणु प्रकृति में स्वतंत्र रूप से भी पाए जाते हैं, लेकिन उनके उपयोग को सरल बनाने के लिए इन्हें प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार करके बाजार में पहुचाया जाता है, जिससे कि इनके उपयोग से फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों से बचाया जा सकता है। बैसिलस थुरिंजिनिसिस : यह एक बैक्टीरिया आधारित जैविक कीटनाशक है, इसके प्रोटीन निर्मित क्रिस्टल में कीटनाशक गुण पाए जाते है, जो कि कीट के आमाशय का घातक जहर है। यह लेपिडोपटेरा और कोलिओपटेरा वर्ग की सुंडियों की 90 से ज्यादा प्रजातियों पर प्रभावी है। इसके प्रभाव से सुंडियों के मुखांग में लकवा हो जाता है, जिससे की सुंडियों खाना छोड़ देती हैं और सुस्त हो जाती है, और 4-5 दिन में मर जाती हैं। यह जैविक, सुंडी की प्रथम और द्वितीय अवस्था पर अधिक प्रभावशाली है। इनकी चार अन्य प्रजातियां बेसिलस पोपुली, बेसिलस स्फेरिक्स, बेसिलस मोरिटी, बेसिलस लेंतीमोर्बस भी कीट प्रबंधन के लिए पाई गई है। प्रयोग: यह एक विकल्पी जीवाणु है, जो विभिन्न फसलों में नुकसान पहुचाने वाले शत्रु कीटों जैसे चने की सुंडी, तम्बाकू की सुंडी, सेमिलूपर, लाल बालदार सुंडी, सैनिक कीट एवं डायमंड बैक मोथ आदि के विरुद्ध एक किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने पर अच्छा परिणाम मिलता है। ये भी पढ़ें : हर दिन करें खेत की निगरानी, कीट और रोगों से फसल रहेगी सुरक्षित विशेषता : बी.टी. के छिड़काव के लिए समय का चयन इस प्रकार करना चाहिए कि जब सुंडी अण्डों से निकल रही हों। जैविक कीटनाशकों को घोल में स्टीकर व स्प्रेडर मिलाकर प्रयोग करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। इस जैविक कीटनाशक को 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर भंडारित नहीं करना चाहिए। इस जैविक कीटनाशक को पहले थोड़े पानी में घोलकर फिर आवश्यक मात्रा में पाउडर मिलाकर घोल बनाये और इसका छिड़काव शाम के समय करना चाहिए। उपलब्धता:- यह बाज़ार में मैजिक किलर के नाम से उपलब्ध हैं वायरस न्यूक्लियर पॉली हाइड्रोसिस वायरस (एनपीवी) : यह एक प्राकृतिक रूप से मौजूद वायरस पर आधारित सूक्ष्म जैविक है। वे सूक्ष्म जीवी जो केवल न्यूक्लिक एसिड व प्रोटीन के बने होते हैं, वायरस कहलाते हैं। यह कीट की प्रजाति विशेष के लिए कारगर होता हैं। चने की सुंडी के लिए एनपीवी व तम्बाकू की सुंडी के लिए एनपीवी का प्रयोग किया जाता है। प्रयोग : कीट प्रबंधन के लिए प्रयुक्त इन वायरसों से प्रभावित पत्ती को खाने से सुंडी 4-7 दिन के अन्तराल में मर जाती है। सबसे पहले संक्रमित सुंडी सुस्त हो जाती है, खाना छोड़ देती है। सुंडी पहले सफ़ेद रंग में परिवर्तित होती है और बाद में काले रंग में बदल जाती है और पत्ती पर उलटी लटक जाती है। इस जैविक उत्पाद को 250 एल.ई. प्रति हैक्टेयर की मात्रा से आवश्यक पानी में मिलाकर फसल में शाम के समय छिड़काव करें, जब हानि पहुंचाने वाले कीटों के अंडो से सुंडिया निकलने का समय हो। इस घोल में दो किलो गुड़ भी मिलाकर प्रयोग करने पर अच्छे परिणाम मिलते हैं। ग्रेनुलोसिस वायरस : इस सूक्ष्मजैविक वायरस का प्रयोग सूखे मेवों के भण्डार कीटों, गन्ने की अगेता तनाछेदक, इन्टरनोड़ बोरर और गोभी की सुंडी से बचने के लिए किया जाता है। यह विषाणु संक्रमित भोजन के माध्यम से कीट के मुख में प्रवेश करता है और मध्य उदर की कोशिकाओं को संक्रमित करते हुये इन कोशिकाओं में वृद्धि करता है और अंत में कीट के अन्य अंगो को प्रभावित करके उसके जीवन चक्र को प्रभावित करता है। कीट की मृत्यु पर विषाणु वातवरण में फैलकर अन्य कीटों को संक्रमित करते हैं। प्रयोग : गन्ने और गोभी की फसल में कीट प्रबंधन के लिए एक किलोग्राम पाउडर लो 100 लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करने से रोकथाम में सहायता मिलती है। फफूंदी कीट प्रबंधन में फफूंदियों का प्रमुख स्थान है। आजकल मित्र फफूंदी बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, जिनकों किसान खरीद कर आसानी से अपनी फसलों में प्रयोग कर सकते हैं। प्रमुख फफूंदियों का विवरण इस प्रकार है : बिवेरिया बेसियाना : कीट के संपर्क में आते ही इस फफूंदी के स्पोर त्वचा के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर अपनी संख्या में वृद्धि करते है, जिसके प्रभाव से कीट कुछ दिनों बाद ही लकवा ग्रस्त हो जाता है और अंत में मर जाता है |

मृत कीट सफ़ेद रंग की मम्मी में तब्दील हो जाता है। मेटारीजियम एनीसोपली : यह बहुत ही उपयोगी जैविक फफूंदी है, जो कि दीमक, ग्रासहोपर, प्लांट होपर, वुली एफिड, बग और बीटल आदि के करीब 300 कीट प्रजातियों के विरुद्ध उपयोग में लाया जाता है। इस फफूंदी के स्पोर पर्याप्त नमी में कीट के शरीर पर अंकुरित हो जाते है जो त्वचा के माध्यम से शरीर में प्रवेश करके वृद्धि करते हैं। यह फफूंदी परपोषी कीट के शरीर को खा जाती है और जब कीट मरता है तो पहले कीट के शरीर के जोंड़ो पर सफ़ेद रंग की फफूंद होती है जो कि बाद में गहरे हरे रंग में बदल जाती है। मित्र फफूंदियों को प्रयोग करने की विधि : मित्र फफूंदियों की 750 ग्राम मात्रा को स्टिकर एजेंट के साथ 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ क्षेत्रफल में सुबह अथवा शाम के समय छिड़काव करने के आशा अनुकूल असर दिखाई पड़ता है। सफ़ेद गिडार के नियंत्रण के लिए 1800 ग्रा. दवाई को 400 ली.पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। मित्र सुत्रकृमी कीटहारी सुत्रकृमियों की कुछ प्रजातियां कीटों के ऊपर परजीवी रहकर उन्हें नष्ट कर देती हैँ। कुछ सुत्रकृमियों जीवाणुओं के साथ सह-जीवन व्यतीत करते है, जो सामूहिक रूप से कीट नियंत्रण में उपयोगी है। सुत्रकृमी डी.डी.136 को धान, गन्ना तथा फलदार वृक्षों के विभिन्न नुकसान पहुँचाने वाले कीटों के नियंत्रण हेतु सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। सूक्ष्म जैविक रोग नाशक: ट्राईकोडर्मा : यह एक प्रकार की मित्र फफूंदी है जो खेती को नुकसान पहुंचाने वाली हानिकारक फफूंदी को नष्ट करती है। ट्राईकोडर्मा के प्रयोग से विभिन्न प्रकार की दलहनी, तिलहनी, कपास, सब्जियों एवं विभिन्न फसलों में पाए जाने वाली मृदाजनित रोग जैसे-उकठा, जड़ गलन, कालर सडन, आद्रपतन कन्द् सडन आदि बीमारियों को सफलतापूर्वक रोकती है। ट्राईकोडर्मा उत्पाद ट्राईकोडर्मा की लगभग छह प्रजातियां उपलब्ध हैं। लेकिन केवल दो प्रजातियां ही जैसे-ट्राईकोडर्मा विरडी एवं ट्राईकोडर्मा हर्जियानम मिट्टी में बहुतायत मात्रा में पाई जाती हैं। उपलब्धता : यह बाज़ार मे myco Shakti के नाम से भी उपलब्ध हैं बीज शोधन: बीज उपचार के लिए 5 से 10 ग्राम पाउडर प्रति किलो बीज में मिलाया जाता है। परन्तु सब्जियों के बीज के लिए यह मात्रा पांच ग्राम प्रति 100 ग्राम बीज के हिसाब से उपयोग में लाई जाती है। न्यूमेरिया रिलाई : यह भी एक प्रकार का फफूंद है जो कीटों में रोग पैदा कर उन्हें नष्ट कर देता है। यह सभी प्रकार के लेपिडोपटेरा समूह के कीटों को प्रभावित करता है, लेकिन यह चना, अरहर के हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा, सैनिक कीट, गोभी एवं तम्बाकू की स्पोडोप्टेरा लिटुरा तथा सेमी लूपर कीट को विशेष रूप से प्रभावित करता है। कार्य पद्धति: फफूंद के बीजाणु छिड़काव के के बाद कीटों के शरीर पर चिपक जाते हैं। फसल पर पड़े फफूंद के संपर्क में आने पर यह जैव क्रिया कर कीटों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं वहां यह कीट के शरीर को तरल तत्व पर अपना विकास कर कवक जाल फैलता है और उन्हें मृत कर देता है। प्रयोग विधि: इस फफूंद के पाउडर के छह भाग को 100 लीटर पानी में घोलकर संध्या काल में इस प्रकार से छिडकाव करे कि पूरी फसल अच्छी तरह से भीग जाए। सुक्ष्जीवों के प्रयोग में सावधानियां : सुक्ष्जीवियों पर सूर्य की परा-बैगनी (अल्ट्रा-वायलेट) किरणों का विपरीत प्रभाव पड़ता है, अत: इनका प्रयोग संध्या काल में करना उचित होता है। सूक्ष्म-जैविकों विशेष रूप से कीटनाशक फफूंदी के उचित विकास हेतु प्रयाप्त नमी एवं आर्द्रता की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म-जैविक नियंत्रण में आवश्यक कीड़ों की संख्या एक सीमा से ऊपर होनी चाहिए। इनकी सेल्फ लाइफ कम होती है, अत: इनके प्रयोग से पूर्व उत्पादन तिथि पर अवश्य ध्यान देना चाहिए |

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