शुक्राणु और अण्डाणु का मिलन

पुरूष के केवल एक शुक्राणु से ही जीवन की रचना हो सकती है। पुरूष को शिक्राणुओं के तीन भाग होते है। 1. सिर 2. गर्दन 3. दुम। पुरूषों के शुक्राणु दुम की सहारे सेमिनल वेसाईकल द्रव में तैरते हुए स्त्री के अंडाणु तक पहुंचते है। स्त्री के अण्डाणु से मिलने के बाद शुक्राणुओं का सिर स्त्री के अंडे की झिल्ली को फाड़कर उसमें प्रवेश कर जाता है तथा शुक्राणुओं का गर्दन और दुम बाहर रह जाता है। जब स्त्री-पुरूषों के अण्डाणु और शुक्राणु आपस में मिलते है तो जाइगोट का जन्म होता है। स्त्री और पुरूष के गुणों के कण आपस में मिलने के बाद बढ़ने लगता है। ये बढ़ते-बढ़ते 2 से 4, 8, 16, 32 कोश बनाते है। यह कोश इसी तरह 265 दिन तक बढ़ने के बाद एक बच्चे का आकार लेते है।

मासिक स्राव
स्त्री को जिस दिन से माहवारी आना प्रारम्भ होता है। उस दिन से वे इसकी गिनती का कार्य दूसरे लोगों पर छोड़ देते है। स्त्रियों में माहवारी पारिवारिक वातावरण, देश, मौसम आदि पर निर्भर करती है। हमारे देश के गर्म तथा तरगर्म इलाकों में लड़कियों में मासिक धर्म (माहवारी) 10 वर्ष से 12 वर्ष की उम्र में ही शुरू हो जाती है। तथा ठंडे देशों, प्रदेशों में यह मासिक धर्म 14 या 15 साल की उम्र में आती है।
स्त्रियों में अंडेदानी में 10-14 वर्ष की उम्र से ही उत्तेजित द्रव ‘हार्मोन्स’ निकलता प्रारम्भ हो जाते है। इस हार्मोन्स को इस्ट्रोजन हार्मोन्स कहते है। इस हार्मोन्स के निकलने के कारण स्त्रियों के स्तनों के आकार बढ़ने लगते है। तथा धीरे-धीरे इनका विकास होता रहता है। 18 वर्ष की आयु तक लड़कियों का शरीर पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है। इसके बाद स्त्रियों के शरीर में चर्बी का जमाव, शरीर का गठीला होना, बालों का विकसित होना, गर्भाशय में बच्चेदानी का पनपना और बढ़ना, जननांगों का विकास, नलियों का बढ़ना तथा प्रत्येक महीने के बाद माहवारी का आना प्रमुख पहचान बन जाती है। स्त्रियों में प्रारम्भ में माहवारी अनियमित रहती है। माहवारी के नियमित होने में कई महीने का समय लग सकता है। परन्तु माहवारी के नियमित रूप से होने के लिए किसी उपचार की आवश्यकता नहीं होती है। धीरे-धीरे स्त्रियों में माहवारी स्वतः ही नियमित रूप से होने लगती है।
हड्डियों की बनावट
महिलाओं के शरीर की हडिड्यों की रचना प्रकृति ने विशेष रूप से की है जिससे महिलाएं बच्चे का आसानीपूर्वक जन्म दे सकती है। स्त्रियों के कूल्हे की हड्डी पुरूष के कूल्हे की हड्डी की तुलना में अधिक स्थान रखती है। स्त्रियों की कूल्हे की हडिड्यों का आकार सेब की तरह का तथा पुरूषों के कूल्हे हडिड्यां दिल के आकार की होती है। कूल्हे की हडिड्यां मुख्य रूप से तीन प्रकार की हडिड्यों से बना होता है। पीछे की तरफ की हड्डी को सेक्रम, दोनों तरफ की हडिड्यों को ईलियास तथा सामने की ओर हड्डी को प्युबिस कहते है। सेक्रम के नीचे पूंछ के आकार की नुकीली हड्डी होती है जिसको कोसिक्स कहते है। कूल्हे की हडिड्यों का प्रमुख कार्य कूल्हे की मांसपेशियों, अंगों तथा बच्चे को जन्म के लिए पर्याप्त जगह देना होता है। जब स्त्रियां प्रसव के समय बच्चे को जन्म देती है। उस समय अधिक स्थान देने के लिए प्रत्येक जोड़ कुछ खुलता और ढीला होता है ताकि स्त्रियों बच्चे को आसानी से जन्म दे सके।
बच्चे के जन्म का रास्ता पीछे की ओर चौड़ा तथा आगे की ओर छोटा होता है। प्रसव होने के समय बच्चा कूल्हे की हडिड्यों में पहले सीधा नीचे की ओर आता है। फिर 90 अंश के कोण पर घूमने के बाद बच्चे का जन्म होता है।

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