सफ़ेद मूसली की उपयोगी प्रजातियां

सफेद मूसली  (क्लोरोफाइटम बोरिविलिएनमली) लिलीयेसी कुल का एक कंदयुक्त पौधा है जिसकी अधिकतम ऊँचाई 45 सेमी. तक होती है तथा इसकी कंदिल जड़ें (कंद या फिंगर्स) जमीन से अधिकतम 25 सेमी. तक नीचे जाती है। इसके बीज बहुत छोटे, काले रंग के प्याज के बीज के समान होते है।इसका उपयोग बल, वीर्य एवं पुरूषत्व वर्धक के रूप में होता है। सफेद मूसली में किसी भी कारण से आई शरीरिक शिथिलता को दूर करने की क्षमता पाई जाती है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन-सी भरपूर मात्रा में पाए जाते। है।  इसके सेवन से शरीर में कोलेस्ट्रॉल स्तर संतुलित रहता है और शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। शुगर के मरीजो के लिए मूसली उत्तम दवा मानी जाती है।  इसका इस्तेमाल लगभग  सभी आयुर्वेदिक टानिकों जैसे च्यवप्राश आदि तैयार करने में किया जाता है । इसके अलावा माताओं का दुध बढ़ाने, प्रसवोपरान्त होने वाली बीमारियों,  शारीरिक शिथिलता को दूर करने व मधुमेह आदि जैसे असाध्य रोगों के उपचार में आने वाली विभिन्न औषधि निर्माण में सफेद मसली का प्रयोग किया जाता है। अत्यधिक पौष्टिक तथा बलवर्धक होनेे के कारण इसे दूसरे शिलाजीत की संज्ञा दी गई है। चीन और अमेरिका में पाये जाने वाले पौधे जिन्सेंग (पेनेक्स) जितना बलवर्धक माना गया है। विश्व बाजार में सफेद मसूली की अत्यधिक माँग होने के कारण इसकी खेती के अन्तर्गत क्षेत्र विस्तार और प्रति इकाई उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है।

सफ़ेद मूसली की उपयोगी प्रजातियां

सफेद मूसली की विश्व में  लगभग 175 प्रजातियाँ पाई जाती है, परन्तु औषधीय गुण वाली प्रमुख चार जातियाँ है :
1. क्लोरोफाइटम बोरिविलिएनम: यह प्रजाति सामान्यतः सागौन के वनों में छत्तीसगढ़ में बहुतायत में पाई जाती है। इसकी जड़ों की मोटाई प्रायः एकसमान, बेलनाकार ही होती है तथा नीचे की ओर क्रमशः पतली होती जाती है। इसकी मूल गुच्छे में आधार पर संलग्र रहती है। इसकी लम्बाई 10 – 15 सेमी. होती है। अधिक खाद देने पर ये 20 – 25 सेमी. लंबी  हो जाती है।
2. क्लोरोफाइटम लेक्सम: क्लोरोफाइटन लेक्सम की मूल भी आधार से गुच्छे के रूप में निकलती है परंतु प्रारंभ में ये धागे के समान पतली होती है और अंत में ये एकाएक फूल जाती है तथा छोर पर पुनः धागे के समान पतली हो जाती है। इन फुली हुइ जड़ों पर झुर्रियाँ होती है।
3. क्लोरोफाइटम अरून्डीनेशियम: इसकी मूल भी लेक्सम के समान ही होती है परंतु इसकी मूल का फूला हुआ हिस्सा चिकना होता है उसमें लेक्सम के सदृश्य झूरियाँ नहीं होती हैं तथा उसकी तुलना में मूल का आकार बड़ा होता है। यह प्रजाति छत्तीसगढ़ के साल वृक्ष के जंगलों में अधिक पाई जाती है।
4. क्लोरोफाइट ट्रयूबरोजम: इसकी मूल भी आधार से गुच्छों के रूप में निकलती है परंतु आधार से निकलकर से धागे के समान पतली होती हैं। इस पतले हिस्से की लंबाई अरून्डीनेशियम एवं लेक्सम प्रजाति की तुलना में अधिक होती है तथा अंत में फूला हुआ हिस्सा दोनों प्रजातियों की तुलना में अधिक बड़ा तथा इसकी सतह चिकनी होती है पर्ण लंबे व अन्य प्रजातियों की तुलना में चैड़े होते हैं।
सफ़ेद मूसली की गुणवत्ता  के आधार पर इसकी क्लोरोफाइट अरूनडीनेशियम प्रजाति सबसे अच्छी मानी जाती है परन्तु क्लोरोफाइट बोरिविलिएनम प्रजाति की  खेती अधिक प्रचलित है। भारत के विभिन्न प्रदेशो जैसे- बिहार, झारखण्ड, मणिपुर, उउ़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र केरल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के शुष्क एवं उष्ण मिश्रित वनों में प्राकृतिक रूप से सफ़ेद मूसली उगती  है। मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के जंगलों में यह पौधा बरसात में स्वतः उग जाता है जिसे उखाड़कर आदिवासी लोग बाजार में बेते हैं। जंगलो की निरंतर कटाई और वनोषधियों की बढ़ती मांग के कारण जंगलो से इनका अवैद्य दोहन होने लगा है जिसके कारण अनेको औषधीय प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर है।  सफ़ेद मूसली की स्वास्थ्य के क्षेत्र में  निरंतर  बढ़ती  मांग के कारण इसकी  व्यवसायिक स्तर पर खेती  की  जाने लगी है। सफ़ेद मूसली से प्रति इकाई अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए इस ब्लॉग पर प्रस्तुत शस्य तकनीक का अनुशरण करना चाहिए।

खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

सफ़ेद मसूली एक कंदरूपी पौधा है जो कि छत्तीसगढ़ व अन्य प्रदेशों के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है। यह समशीतोष्ण जलवायु वाले वन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। इसको 800 से 1500 मि.मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा पर आधारित फसल के रूप उगाया जा सकता है। इसे छितरी छाया अधिक नमी वाली  उर्वरा भूमि की आवश्यकता होती है। सफ़ेद  मसूली की फसल को तेज धूप व तेज हवाओं से सुरक्षित करना आवश्यक होता है ।

भूमि का चुनाव और खेत की तैयारी

उपयुक्त जल निकास वाली हल्की, रेतीली, दोमट, लाल  वाली भूमि इसकी खेती के लिए अच्छी मानी गई। पथरीली मिट्टी में जड़ों की वृद्धि कम होती है। यह पहाड़ों के ढलानों तथा अन्य ढालू भूमि में भी सफलता पूर्वक उगाई जा सकती है। भूमि का पी.एच. 6-7 होना चाहिए।  रबी की फसल काटने के बाद ग्रीष्म ऋतु में  जैविक खाद डालने के बाद  मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से खेत की गहरी जुताई करनी चाहिये। जुताई करने के बाद 2 बार कल्टीवेटर चलायें जिससे खरपतवार व उनकी जड़ें सूख जाय। उसके बाद डिस्क हैरो  चलाकर खेत की मिट्टी भुरभुरी कर लेनी चाहिए। तदोपरांत पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है। उसके बाद 2 मी. चौड़ी तथा 10 मी. लंबी एवं 20 सेमी. ऊँची  क्यारियाँ बना लेना चाहियेे। एक  क्यारी से दूसरे के बीच में 50 सेमी. का अंतर रखने से निंदाई-गुड़ाई कार्य में आसानी होती है। जल निकास हेतु आवश्यक नालियाँ भी बनाना आवश्यक होता है।

उर्वरकों की जगह जैविक खाद का इस्तेमाल

जैविक पद्धति से उगाई गई सफ़ेद मूसली का बाजार में बेहतर भाव मिलता है।  उत्तम गुणवत्ता की सफेद मसूली प्राप्त करने के लिए जैविक खाद का प्रयोग किया जाता है। अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट अधिक-से-अधिक मात्रा में देने से अधिक मूल की उपज ली जा सकती है। सामान्यतः ग्रीष्म ऋतु में 10 से 15 टन गोबर की खाद/हेक्टेयर खेत में समान रूप से डालकर खेत तैयार  करना चाहिए। कच्ची खाद डालने से मूल में सड़न/गलन रोग का प्रकोप हो जाता है तथा पौधे मर सकते हैं। केंचुआ खाद या हरी खाद के प्रयोग से  सफेद मसूली का अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।

रोपाई के उपयुक्त समय

मानूसन की वर्षा प्रारंभ होने पर जुलाई में इसकी रोपाई संपन्न कर लेना चाहिए  है। शीत या ग्रीष्म ऋतु में सफ़ेद मूसली  सुसुप्ता अवस्था में रहती है अतः इन ऋतुओं में इसे नही लगाना चाहिए। वर्षा प्रारंभ होते ही पत्तियाँ निकल आती हैं व पौधे  वृद्धि करने लगते है। प्रसुप्ति काल समाप्त होते ही भंडारित ट्सूबर्स (फिंगर्स) की कलियों की वृद्धि प्रारंभ हो जाती है, जिसे उनके रोपण का उपयुक्त समय समझना चाहिए।

उपयुक्त बीज और बुआई

सफेद मसूली का प्रवर्धन (प्रसारण) इसके घनकन्दों द्वारा होता है। इसकी डिस्क या अक्ष में जो कलियाँ होती हैं उन्ही को बीज के रूप में उपयोग करते हैं। पूर्व की फसल से निकाले गये कंदों का उपयोग भी किया जा सकता है। बीज के लिए फिंगर्स (ट्यूर्बस) का उपयोग करते हुए यह बात अवश्य ध्यान में रखे कि फिंगर्स के साथ पौधे की डिस्क का कुछ भाग अवश्य साथ में लगा रहे तथा फिंगर (ट्यूबर) का छिलका भी क्षतिग्रस्त नहीं होना चाहिए अन्यथा पौधे के उगने में कठिनाई होगी। अच्छी फसल लेने के लिए ट्यूबर (फिंगर) का वजन 5-10 ग्राम होना चाहिए। अच्छी फसल के लिए उत्तम गुणवत्ता वाला प्रामाणिक बीज किसी विश्वसनीय संस्थान से लेना चाहिए। एक हेक्टेयर के लिए  लगभग 2 लाख (लगभग 10-15 क्विण्टल) बीज (क्राउनयुक्त फिंगर्स) पर्याप्त रहता है। इतना अधिक बीज (फिंगर्स) एक बार खरीदने में अधिक खर्च आता है। अतः प्रथम बार केवल 1/4 एकड़ अथवा 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में रोपाई की जा सकती है। इससे लगभग 6 क्विंटल  नये पौधे तैयार हो जाते हैं जिन्हें आगामी वर्ष रोपने हेतु उपयोग में लाया जा सकता है।

रोपाई करने की विधि

सफेद मसूली के बीज (फिंगर्स) को 20 सेमी. कतारों -से-कतारों की दूरी पर तथा बीज-से-बीज 15 सेमी. की दूरी पर लगाना आवश्यक है। ध्यान रहे कि रोपने की गहराई उतनी ही हो जितनी मूल की लंबाई हो जो अक्ष का भाग मूल से संलग्र रहता है। वह भूमि की ऊपरी सतह के बराबर हो उसको मृदा से ढँकना नहीं चाहिये। केवल मूल ही मृदा के अंदर रहे। लगाते समय क्यारी में कुदाली से 5-6 सेमी. गहरी लाइनें 20 सेमी. के अंतर से बना ले। मूल या पूरी डिस्क लगाने के बाद उसके चारों तरफ मिट्टी भरकर दबा देना चाहिए। ध्यान रहे फिंगर पूरी तरह मिट्टी के अंदर न हो उसकी प्रसुप्त कलिकायें भूमि की सतह पर होना चाहिए।

सिंचाई और निंदाई-गुड़ाई

सफ़ेद मूसली रोपने के बाद यदि वर्षा नहीं होती है तब सिंचाई की आवश्यकता होती है अन्यथा इसकी फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। यदि 15 सितम्बर के बाद वर्षा न हो तब अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में एक सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई करने हेतु खेत में खुला पानी दे सकते हैं। स्प्रिकलर के द्वारा सिंचाई करना अधिक उपयुक्त होता है। असमान्य वर्षा होने पर दो बार सिंचाई की आवश्यकता सितम्बर के मध्य या अक्टूबर माह में होती है। मसूली के खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए। इसके लिए कम-से-कम 2-3 निराई गुड़ाई करना आवश्यक है। इसकी निंदाई-गुड़ाई  30 दिन व 45 दिन की अवस्था पर करें। निंदाई हेंड हो या खुरपी की सहायता से करें परंतु ध्यान रखे कि  पौधों की जड़ें प्रभावित न हो।

सफेद मसूली की खुदाई एवं उपज

सफेद मसूली की फसल मौसम के अनुसार 180-200  दिनों में तैयार हो जाती है। इस फसल के पत्तों का सूख जाना, फसल के तैयार हो जाने का सूचक है। परन्तु पत्तों के सूख कर गिर जाने के उपरान्त भी 30-35 दिनों तक कन्दों को जमीन में ही रहने दिया जाना चाहिये तथा हल्का पानी देते रहना चाहिए। प्रारम्भ में कंदों का रंग सफेद होता है। जब कंद पूर्णतया पक जाते हैं तो इनका रंग गहरा भूरा हो जाता है। प्रायः कन्द निकालने का कार्य मार्च अप्रैल में किया जाता है। खुदाई के 2 दिन पहले स्प्रिंकलर से हल्की सिंचाई करने से मूसली  खोदने में  आसानी होती है। खुदाई कुदाली या खुरपी की मदद से सावधानी पूर्वक करना चाहिए, जिससे इसके कंद क्षतिग्रस्त न होने पाएं । सफेद मसूली की अच्छी फसल से औसतन 20-25 ग्राम वजन वाले कन्द होते हैं तथा एक पौधे से 10-12 फिंगर्स प्राप्त होते हैं। आमतौर पर बोये गये बीज की तुलना में सफेद मसूली का 5-10 गुना अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।
ताजा सफेद मसूली का उत्पादन 50 से 55 क्विण्टल/हेक्टेयर होता है जो सूखने पर 9 से 10 क्विण्टल  रह जाती है। शुष्क सफेद मसूली का बाजार भाव उपज की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

प्रसंस्करण व सुखाना

मूसली की खुदाई करने के बाद सफाई करना आवश्यक है। यदि मसूली में मिट्टी लगी है तो उसको पानी से धो कर साफ करने के बाद मसूली को डिस्क से तोड़कर पृथक् कर लेते हैं। बाद में मसूली के ऊपरी सतह से छिलके निकालना चाहिए। छिलका चाकू या खुरदरे पत्थर आदि से घिस कर साफ करें व सूखने के लिये धूप में डालें। साफ करने के बाद मसूली को सफेद नये कपड़े/पालीथीन पर सुखाना चाहिए। अन्यथा मसूली का रंग सफेद नहीं होगा। अतः सफाई व सुखाई का कार्य सावधीपूर्वक करना आवश्यक है। मसूली में फफूँद आदि का आक्रमण नहीं होना चाहिए। छोटी मूसली को डिस्क सहित छाया में रेत के अंदर भंडारित कर अगली वर्ष की फसल रोपने के काम में लेना चाहिए ।

उचित भंडारण

प्रसंस्कृत की हुई शुष्क मूल को पालीथीन की थैलियों या नायलान की बोरियों में पैक करके शुष्क स्थान में भंडारित चाहिए। सफेद मसूली की उपज को आवश्यकतानुसार बाजार में बेचा जा सकता है। बीज रोपने हेतु एक दो छोटी मूल सहित डिस्क का भंडारण रेत में छायादार कमरे में करते हैं। यदि खेत में ही खोदते समय डिस्क के साथ संलग्न एक दो छोटी मसूली को छोड़ दिया जाय तो पृथक् रूप से भंडारण की आवश्यकता नहीं होती है। वे शीत व ग्रीष्म काल में खेत में ही पड़ी रहकर अगले वर्ष बीज का काम करती है। बीज के लिए छोड़ी गई डिस्क सहित मूल में सिचाई  नहीं करना चाहिए ।
लेखक-  डॉ.गजेंद्र सिंह तोमर, प्रोफेसर (एग्रोनोमी), इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, राजमोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र अजिरमा

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