जल संसाधन, उपयोगिता और जल संकट

जल संसाधन पानी के वह स्रोत हैं जो मानव के लिए उपयोगी हों या जिनके उपयोग की संभावना हो। पानी के उपयोगों में शामिल हैं कृषि, औद्योगिक, घरेलू, मनोरंजन हेतु और पर्यावरणीय गतिविधियों में। वस्तुतः इन सभी मानवीय उपयोगों में से ज्यादातर में ताजे जल की आवश्यकता होती है।

पृथ्वी पर पानी की कुल उपलब्ध मात्रा अथवा भण्डार को जलमण्डल कहते हैं। पृथ्वी के इस जलमण्डल का 97.5% भाग समुद्रों में खारे जल के रूप में है और केवल 2.5% ही मीठा पानी है, उसका भी दो तिहाई हिस्सा हिमनद और ध्रुवीय क्षेत्रों में हिम चादरों और हिम टोपियों के रूप में जमा है। शेष पिघला हुआ मीठा पानी मुख्यतः जल के रूप में पाया जाता है, जिस का केवल एक छोटा सा भाग भूमि के ऊपर धरातलीय जल के रूप में या हवा में वायुमण्डलीय जल के रूप में है।

मीठा पानी एक नवीकरणीय संसाधन है क्योंकि जल चक्र में प्राकृतिक रूप से इसका शुद्धीकरण होता रहता है, फिर भी विश्व के स्वच्छ पानी की पर्याप्तता लगातार गिर रही है दुनिया के कई हिस्सों में पानी की मांग पहले से ही आपूर्ति से अधिक है और जैसे-जैसे विश्व में जनसंख्या में अभूतपूर्व दर से वृद्धि हो रही हैं, निकट भविष्य मैं इस असंतुलन का अनुभव बढ़ने की उम्मीद है। पानी के प्रयोक्ताओं के लिए जल संसाधनों के आवंटन के लिए फ्रेमवर्क (जहाँ इस तरह की एक फ्रेमवर्क मौजूद है) जल अधिकार के रूप में जाना जाता है।

आज जल संसाधन की कमी, इसके अवनयन और इससे संबंधित तनाव और संघर्ष विश्वराजनीति और राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। जल विवाद राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं।

मीठे जल के स्रोत

धरातलीय जल
धरातलीय जल या सतही जल पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला पानी है जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ढाल का अनुसरण करते हुए सरिताओं या नदियों में प्रवाहित हो रहा है अथवा पोखरों, तालाबों और झीलों या मीठे पानी की आर्द्रभूमियों में स्थित है। किसी जलसम्भर में सतह के जल की प्राकृतिक रूप से वर्षण और हिमनदों के पिघलने से पूर्ति होती है और वह प्राकृतिक रूप से ही महासागरों में निर्वाह, सतह से वाष्पीकरण और पृथ्वी के नीचे की ओर रिसाव के द्वारा खो जाता है।

हालाँकि कि किसी भी क्षेत्रीय जल तंत्र में पानी का प्राकृतिक स्रोत वर्षण ही है और इसकी मात्रा उस बेसिन की भौगोलिक अवस्थिति और आकार पर निर्भर है। इसके अलावा एक जल तंत्र में पानी की कुल मात्रा किसी भी समय अन्य कई कारकों पर निर्भर होती है। इन कारकों में शामिल हैं झीलों, आर्द्रभूमियों और कृत्रिम जलाशयों में भंडारण क्षमता; इन भण्डारों के नीचे स्थित मिट्टी की पारगम्यता; बेसिन के भीतर धरातलीय अपवाह के अभिलक्षण; वर्षण की अवधि, तीव्रता और कुल मात्रा और स्थानीय वाष्पीकरण का स्तर इत्यादि। यह सभी कारक किसी जलतंत्र में जल के आवागमन और उसके बजट को प्रभावित करते हैं।

मानव गतिविधियाँ इन कारकों पर एक बड़े पैमाने पर प्रभाव डाल सकती हैं। मनुष्य अक्सर जलाशयों का निर्माण द्वारा बेसिन की भंडारण क्षमता में वृद्धि और आद्रभूमि के जल को बहा कर बेसिन की इस क्षमता को घटा देते हैं। मनुष्य अक्सर अपवाह की मात्रा और उस की तेज़ी को फर्शबन्दी और जलमार्ग निर्धारण से बढ़ा देते हैं।

किसी भी समय पानी की कुल उपलब्ध मात्रा पर ध्यान देना भी जरूरी है। मनुष्य द्वारा किये जा रहे जल उपयोगों में से बहुत सारे वर्ष में एक निश्चित और अल्प अवधि के लिये ही होते हैं। उदाहरण के लिए अनेक खेतों को वसंत और ग्रीष्म ऋतु में पानी की बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है और सर्दियों में बिल्कुल नहीं। ऐसे खेत को पानी उपलब्ध करने के लिए, सतह जल के एक विशाल भण्डारण क्षमता की आवश्यकता होगी जो साल भर पानी इकठा करे और उस छोटे समय पर उसे प्रवाह कर सके जब उसकी आवश्यकता हो। वहीं दूसरी ओर कुछ अन्य उपयोगों को पानी की सतत आवश्यकता होती है, जैसे की विद्युत संयंत्र जिस को ठंडा करने के लिए लगातार पानी चाहिये। ऐसे बिजली संयंत्र को पानी देने के लिए सतह पर प्रवाहित जल की केवल उतनी ही मात्रा को भंडारित करने की आवश्यकता होगी कि वह नदी में पानी के कम होने की स्थिति में भी बिजली संयंत्र को शीतलन के लिये पानी उपलब्ध करा सके।

दीर्घकाल में किसी बेसिन के अन्दर वर्षण द्वारा पानी की कितनी मात्रा की पूर्ती की जाती है यही उस बेसिन की मानव उपयोगों हेतु जल उपलब्धता की ऊपरी सीमा होती है।

प्राकृतिक धरातलीय जल की मात्रा को किसी दूसरे बेसिन क्षेत्र से नहर या पाइप लाइन के माध्यम से आयात द्वारा संवर्धित किया जा सकता है। मनुष्य प्रदूषण द्वारा जल को ‘खो’ सकता है (यानी उसे बेकार बना सकता है)।

मीठे जल के भण्डारों के मामले में ब्राज़ील दुनिया सबसे अधिक जल भण्डार रखने वाला देश है जिसके बाद बाद दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं रूस और कनाडा।

नदी तली के नीचे का प्रवाह
नदी के पूरे मार्ग में नीचे की ओर प्रवाहित जल की मात्रा केवल वही नहीं होती जो स्वतंत्र जलधारा के रूप में बहती हुई दिखती है बल्कि नदी की तली के ठीक नीचे भी काफ़ी पानी प्रवाहित होता रहता है। यह पानी तली के असंगठित पदार्थों के बीच से होकर बहता है जैसे कि कंकड़ों और गोलाश्मों की मोटी परत के बीच से होकर। ऐसे प्रवाह को अवप्रवाह कहते है और यह कभी कभी दिखाई पड़ने वाले प्रवाह से अधिक भी हो सकता है। नदी के नीचे अवप्रवाह की इस पेटी को अवप्रवाह मण्डल कहा जाता है। एक प्रकार से यह वह पेटी है जहाँ भूजल और नदीजल का आपसी अंतर मिट जाता है। यह कार्स्ट प्रदेशों और तराई क्षेत्र में काफ़ी महत्वपूर्ण होता है।

भूजल
भूजल या भूमिगत जल मीठे जल का हिस्सा है जो मिट्टी और चट्टानों के रंध्राकाशों (pore) में स्थित होता है। यह जल स्तर के नीचे जलभरे (aquifer) के भीतर बहने वाला जल भी है। भूजल के इस प्रवाह को अधोप्रवाह (underflow) कहा जाता है। कभी-कभी सतह के ठीक नीचे के जल को भूजल तथा अत्यधिक गहराई में पाए जाने वाले जल को भूगर्भिक जल या जीवाश्म जल (fossil water) भी कहते हैं।

भूजल को यदि एक विशाल जल भण्डार माना जाय तो इस भण्डार में जल का आगमन या इसको पानी की उपलब्धता धरातल की सतह के ऊपर के सतही जल के नीचे की ओर रिसाव द्वारा होती है और इससे जल का निष्कासन अधोप्रवाह द्वारा समुद्रों में या फिर अत्यधिक गहरे जीवाश्म जल के रूप में होता है। अतः भूजल भी कई मायनों में धरातलीय जल जैसा ही होता है: जल तंत्र में आदान-प्रदान और भण्डारण के सन्दर्भ में यदि इसकी तुलना धरातलीय जल से की जाए तो महत्वपूर्ण अंतर यह है कि गमनागमन की धीमी गति होने के कारण भूजल के भंडार आमतौर पर धरातलीय जल से अधिक विशाल और स्थाई होते हैं। इस अन्तर के कारण मानव आसानी से भूजल का लम्बे समय तक बिना गंभीर परिणामों के गैर दीर्घकालिक उपयोग कर सकते हैं। हालाँकि यह भी ध्यातव्य है कि भूजल एक बार प्रदूषित हो जाने पर इसके प्राकृतिक चक्रण द्वारा साफ़ होने की प्रक्रिया और भी धीमी है।

विलवणीकरण
विलवणीकरण (Desalination) एक कृत्रिम प्रक्रिया है जिसके द्वारा खारा पानी (saline water) (आम तौर पर समुद्र का पानी ताजे पानी में बदला जाता है सब से आम विलवणीकरण प्रक्रियाएं आसवन (distillation) और उलट परासरण (reverse osmosis) हैं। फिलहाल अन्य वैकल्पिक स्रोतों की तुलना में विलवणीकरण एक बहुत महंगा विकल्प है और कुल मानव उपयोग का एक बहुत छोटा अंश ही इस के द्वारा पूरा होता है यह केवल आर्थिक दृष्टि से उत्तम व्यावहारिक-मूल्य वाले क्षेत्रों (जैसे घरेलू और औद्योगिक उद्योगों के लिए) या फिर शुष्क क्षेत्रों में उपयोगी है। विलवणीकरण का सबसे व्यापक उपयोग फारस की खाड़ी के क्षेत्र में है।

जमा हुआ जल
हिमशैल (iceberg) को जल के स्रोत के रूप में उपयोग करने के लिए कई प्रस्ताव रखे गए हैं किंतु आज तक यह केवल नवीन परियोजनों के लिए विचाराधीन ही है। हिमानी अपवाह को भी धरातलीय जल माना जाता है।

मीठे जल के उपयोग
मीठे जल या ताजे पानी के उपयोग को नवीकरणीय और अ-नवीकरणीय प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि जल तुरंत एक और उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं हो तो यह उपयोग अनवीकरणीय उपयोग होगा। भूतल की नीचे की ओर रिसाव और वाष्पीकरण में होने वाली क्षति एवं किसी उत्पादन में सम्मिलित जल (जैसे कृषि उपज) को नवीकरणीय माना जाता है। वह जल भी जिसे शोधित कर सतह के जल के रूप में लौटाया जा सके नवीकरणीय माना जाता है।

कृषि उपयोग
अनुमान लगाया जाता है की पृथ्वी पर कुल जल उपयोग का ६९% जल सिंचाई के लिए उपयोग होता है जिसका 15% से 35% सिंचाई आहरण धारणीय या सतत उपयोग नहीं है।

विश्व के कुछ क्षेत्रों में सिंचाई किसी भी फसल के लिए आवश्यक है जबकि अन्य क्षेत्रों में यह अधिक लाभदायक फसलों की बढ़त अथवा फसल पैदावार की वृद्धि में कारगर है। विभिन्न सिंचाई विधियों में फसल पैदावार, जल खपत एवं उपकरणों और संरचनाओं की पूंजी लागत में गमागम शामिल हैं। सतह के ऊपर या नीचे के सेचक (sprinkler) कम मेहेंगे किंतु कम कारगर भी होते हैं, क्योंकि अधिकतर जल वाष्पिभूत हो जाता है या रिस जाता है अधिक कारगर सिंचाई विधियों में शामिल हैं रिसाव सिंचाई (drip or trickle irrigation), प्रवाह सिंचाई और सेचक सिंचाई जिस में सेचक जमीनी स्तर के पास संचालित किए जाते हो यह प्रणालिया मेहेंगी है, किंतु रिसाव और वाष्पीकरण को कम करने में सार्थक हैं कोई भी प्रणाली यदि अनुचित व्यर्थ प्रबंधित हो तो अपव्ययी होती है एक और गमागम जिसे अक्षम विचार मिलता है, वेह है उप सतह के पानी का खारा होना। पश्चिम राजस्थान में वर्षा जल को अपने खेत में ही रोकने की परम्परागत विधि खड़ीन है। इससे अच्छी पैदावार ली जाती है.

जलीय कृषि (Aquaculture) जल का एक छोटा लेकिन बढ़ता प्रयोग है। मीठे पानी में व्यावसायिक मत्स्य पालन भी पानी का कृषि उपयोग माना जाता है, लेकिन इसे सिंचाई से कम महत्व दिया जाता है।

जैसे-जैसे विश्व की जनसंख्या और अनाज की मांग में वृद्धि हो रही है जल के सीमित स्रोतों के इष्टतम उपयोग द्वारा अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिये सिंचाई की विधियों और प्रौद्योगिकी, कृषि जल प्रबंधन, शस्य संयोजन और जल संरक्षण के क्षेत्र में विकास की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

औद्योगिक उपयोग
अनुमान हैं की विश्व भर के 15% जल का उपयोग औद्योगिक है। प्रमुख औद्योगिक उपयोगकर्ताओं में शामिल हैं तापीय बिजली घर जो पानी को शीतलन के लिए उपयोग करते हैं। वहीं जलविद्युत संयंत्र पानी को बिजली स्रोत के रूप में उपयोग करते हैं। अयस्क और पेट्रोलियम संयंत्र रासायनिक प्रक्रियाओं में पानी का उपयोग करते हैं और कई विनिर्माण संयंत्र इसे एक विलायक के रूप में उपयोग करते हैं। औद्योगिक उपयोग में नष्ट होने वाले पानी में व्यापक विवधिता है पर वैश्विक स्तर पर यह कृषि उपयोग में होने वाले क्षय से कम है।

घरेलू उपयोग
अनुमान लगाया जाता है की विश्व में कुल जल उपयोग का 15% जल घरेलू उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाया जाता है इन में शामिल हैं पीने का पानी, स्नान, खाना पकाने, स्वच्छता और बागवानी (gardening) इत्यादि। पीटर गलैक (Peter Gleick) के अनुमान अनुसार घरों की बुनियादी आवश्यकताओं के लिए प्रति दिन प्रति व्यक्ति लगभग 50 लीटर की खपत है और इस में बगीचों के लिए पानी शामिल नहीं है।

मनोरंजन
मनोरंजन के लिए प्रयोग होने वाला जल आमतौर पर कुल जल प्रयोग का एक बहुत छोटा किन्तु बढ़ता हुआ हिस्सा है। मनोरंजन में पानी का उपयोग अधिकतर जलाशयों, क्षिप्रिकाओं, झरनों और साहसिक खेलों से जुड़ा हुआ है। यदि एक जलाशय में पानी का स्तर सामान्य की तुलना में अधिक रखा जाय तो मनोरंजक खपत के लिए उसका उपयोग एक नवीकरणीय या अक्षय उपयोग के तौर पर वर्गीकृत किया जा सकता है। कुछ जलाशयों से जल निर्गमन श्वेत जल (whitewater) के रूप में दृश्यावलोकन और राफ्टिंग (नाव खेना) इत्यादि मनोरंजक कार्यों के लिए समयबद्ध किया जाता है जो मनोरंजक उपयोग माना जा सकता है। अन्य उदाहरण स्कीयर, प्रकृति उत्साही और तैराक हैं जो जल का इस रूप में उपयोग करते हैं। आधुनिक सभ्यता में वाटर पार्क जैसी सुविधाएँ भी इसी श्रेणी में गिनी जा सकती हैं।

मनोरंजक उपयोग आमतौर पर गैरक्षयी होता है। गोल्फ कोर्स पानी की अत्यधिक मात्रा का उपयोग करने के लिए प्रसिद्द है, विशेषकर खुश्क क्षेत्रों में। बहरहाल, यह स्पष्ट नहीं है की मनोरंजक सिंचाई के लिए जल का उपयोग (जिस में निजी उद्यानों शामिल होंगे) पानी के संसाधनों पर क्या प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। ऐसा काफी हद तक विश्वसनीय डेटा के आभाव के कारण है। कैलिफोर्निया की सरकार सहित कुछ सरकारों ने गोल्फ कोर्स में जल के उपयोग को कृषि करार दिया है ताकि पर्यावरणविद् इसे जल बर्बादी न कह पायें हालांकि उपरोक्त आंकड़ों का एक आधार के रूप में उपयोग करते हुए, इस हेर-फेर का वास्तविक सांख्यिकीय प्रभाव शून्य के करीब माना जाता है।

इसके अतिरिक्त, मनोरंजन में उपयोग अन्य उपयोगकर्ताओं के लिए विशिष्ट समय और स्थानों पर पानी की उपलब्धता में कमी का कारण भी हो सकता है। उदाहरण के लिए पानी के एक जलाशय में देर गर्मियों में नौकायन के लिए बनाए रखना और किसानों को बसंत के मौसम की खेती के दौरान उपलब्ध नहीं रखना ऐसा ही उपयोग होगा। श्वेत जल राफ्टिंग के लिए जल निर्गमन बिजली की मांग के व्यस्ततम समय पर पनबिजली उत्पादन के लिए जल की अनुपलब्धता में परिणत हो सकता है।

पर्यावरणीय उपयोग
स्वच्छ पर्यावरण के लिये पानी का प्रयोग भी एक बहुत छोटा उपयोग है लेकिन बढ़ती कुल जल का प्रयोग का प्रतिशत है। पर्यावरणीय जल उपयोगों में शामिल हैं – कृत्रिम आर्द्रभूमि निर्माण, वन्यजीव आवास के लिए अपेक्षित कृत्रिम झीलें, बाँध के इर्द गिर्द मत्स्य सोपान और मछली पालन के लिए समयबद्ध जलाशयों से जल मुक्ति इत्यादि।

मनोरंजन के साधन के उपयोग की तरह, पर्यावरणीय उपयोग गैर क्षय वाला है लेकिन विशिष्ट समय और स्थानों पर अन्य उपयोगकर्ताओं के लिए पानी की उपलब्धता में कमी का कारण हो सकता है। उदहारण के लिए जलाशय से मछली उद्योग के लिए जल मुक्ति के बाद पानी ऊपरी खेतों के लिए उपलब्ध नहीं होगा।

जल संकट

जल संकट और जल तनाव (water stress) की अवधारणा सरल है: सतत विकास के लिए विश्व व्यापार परिषद (World Business Council for Sustainable Development) के अनुसार यह उन परिस्थितियों पर लागू होता है जहां सभी उपयोगों के लिए पर्याप्त पानी नहीं उपलब्ध है चाहे वे औद्योगिक, कृषि या घरेलू उपयोग हों। प्रति व्यक्ति (per capita) उपलब्ध जल तनाव को परिभाषित करना जटिल है, तथापि यह धारणा है कि जब प्रति व्यक्ति वार्षिक अक्षय मीठे पानी की उपलब्धता 1700 घनमीटर से कम हो, तो देश अल्पावधिक या नियमित रूप से पानी तनाव का अनुभव करने लगते हैं। 1000 घन मीटर से कम जल उपलब्धता आर्थिक विकास और मानव स्वास्थ्य और समृद्धि में बाधा डालती है।

जनसंख्या वृद्धि और जल संसाधन
सन् 2000 में, दुनिया की आबादी 6.2 अरब थी। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है की सन् 2050 तक जनसँख्या में 3 अरब की वृद्धि हो जायेगी और इसका ज्यादातर हिस्सा विकासशील देशों में जनसंख्या वृद्धि करेगा जो पहले से ही जल तनाव से ग्रस्त हैं।[9] इस लिए जल की मांग और बढेगी जब तक इस महत्वपूर्ण संसाधन में जल संरक्षण और पुनर्प्रयोग (recycling) द्वारा अनुकूल वृद्धि नहीं होती।

समृद्धि में बढ़त
गरीबी उन्मूलन दर की वृद्धि हो रही है खासकर चीन और भारत जैसे दो जनसंख्या दिग्गजों में। बहरहाल, बढ़ती समृद्धि (affluence) का मतलब है निश्चित रूप से अधिक पानी की खपत। 24 घंटे, 7 दिन मीठे पानी की आवश्यकता और बुनियादी स्वच्छता (sanitation) से ले कर उद्यान सिंचाई और गाड़ी धोने के लिए पानी की मांग करने से ले कर जकुज्जी या निजी तरणताल की चाहत तक यह समृद्धि जल की माँग में वृद्धि ही करेगी।

व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार
तेज़ी से हो रहे औद्योगीकरण से सेवा क्षेत्र जैसे पर्यटन और मनोरंजन जैसी व्यावसायिक गतिविधियां तेजी से विस्तार कर रहीं हैं। इस विस्तार के फलस्वरूप पूर्ति और स्वच्छता सहित जल सेवाओं में वृद्धि होती है जो पानी और प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिक तंत्र पर और अधिक दबाव के कारण हो सकते हैं।

तीव्र शहरीकरण
शहरीकरण के रुझान इसमें तीव्र वृद्धि के हैं। निजी लघु कुँए और गटर (septic tank) जो कम घनत्व समुदायों में कारगर साबित होते हैं, भारी घनत्व के शेहरी क्षेत्रों में सक्षम नहीं होते। शहरीकरण के होते जल सम्बंधित बुनियादी सुविधाओं में महत्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता है। व्यक्तियों तक पानी पहुंचाने के लिए और मलजल को और प्रदूषित और दूषित जल का उपचार किये जाने को सुविधाओं का विकास अनिवार्य है अन्यथा ये सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम बन जायेंगे। 60% यूरोपीय शेहेरों में जिस की जनसँख्या 100,000 से अधिक है, वहाँ भूमिगत जल तेज दर से प्रयोग किया जा रहा है। यदि कुछ जल उपलब्ध है, तो उसे ग्रहण करने की लागत में वृद्धि ही वृद्धि (costs more and more) हो रही है।

जलवायु परिवर्तन और जल संसाधन
जलवायु परिवर्तन मौसम और जल चक्र के बीच अभिन्न संबंधों के कारण दुनिया भर के जल संसाधनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। बढ़ते तापमान के रहते वाष्पीकरण में वृद्धि होगी और परिणामतः वर्षण में भी वृद्धि होगी, हालांकि वर्षा में क्षेत्रीय विवधिता में भी वृद्धि होगी। कुल मिलाकर, ताजे पानी की वैश्विक आपूर्ति में वृद्धि होगी लेकिन सूखा और बाढ़ विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग समय पर अक्सर हो सकते हैं और पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी और तुषार पिघलाव की संभावना है। बढ़ा तापमान जल गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करेगा यह अच्छी तरह समझा नहीं गया है। संभावित प्रभावों में शामिल हैं जलधाराओं और जलाशयों का यूट्रोफिकेशन इत्यादि। जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि सिंचाई, उद्यान सेचक और शायद तरणताल की मांगों में वृद्धि भी हो सकती है।

जलभरों का रिक्तीकरण
मानव आबादी के विस्तार के कारण जल के लिए प्रतिस्पर्धा ऐसे बढ़ रही है की विश्व के प्रमुख जलभरे समाप्त होते जा रहे हैं। यह भूमिगत जल के द्वारा कृषि सिंचाई और प्रत्यक्ष मानव उपभोग दोनों के लिए कड़वा यथार्थ है। पूरी दुनिया में सभी आकार के लाखों पम्प इस समय भूमिगत जल निकाल रहे हैं। उत्तरी चीन और भारत जैसे शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई भूमिगत जल के द्वारा और असम्वृधीय दर से निचोडा जा रहा है। जिन्हों ने जलस्तर में गिरावट अनुभव की हैं, उन शहरों में शामिल हैं मेक्सिको सिटी, बैंकॉक, मनीला, बीजिंग, मद्रास और शंघाई इत्यादि।

अन्य जगहों की तरह भारत में भी भूजल का वितरण सर्वत्र समान नहीं है। भारत के पठारी भाग हमेशा से भूजल के मामले में कमजोर रहे हैं। यहाँ भूजल कुछ खास भूगर्भिक संरचनाओं में पाया जाता है जैसे भ्रंश घाटियों और दरारों के सहारे। उत्तरी भारत के जलोढ़ मैदान हमेशा से भूजल में संपन्न रहे हैं लेकिन अब उत्तरी पश्चिमी भागों में सिंचाई हेतु तेजी से दोहन के कारण इनमें अभूतपूर्व कमी दर्ज की गई है। भारत में जलभरों और भूजल की स्थिति पर चिंता जाहिर की ज रही है। जिस तरह भारत में भूजल का दोहन हो रहा है भविष्य में स्थितियाँ काफी खतरनाक होसकती हैं। वर्तमान समय में 29% विकास खण्ड या तो भूजल के दयनीय स्तर पर हैं या चिंतनीय हैं और कुछ आंकड़ों के अनुसार 2025 तक लगभग 60% ब्लाक चिंतनीय स्थितिमें आ जायेंगे।

ध्यातव्य है कि भारत में 60% सिंचाई एतु जल और लगभग 85% पेय जल का स्रोत भूजल ही है, ऐसे में भूजल का तेजी से गिरता स्तर एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है।

जल प्रदूषण आज विश्व के प्रमुख चिंताओं में से एक है। कई देशों की सरकारों की इस समस्या को कम करने के लिए समाधान खोजने के लिए कड़ी मेहनत की है। जल आपूर्ति को कई प्रदूषकों से खतरा है, किंतु सब से अधिक व्यापक विशेषकर अल्पविकसित देशों में है। कच्चे मलजल का प्राकृतिक जल में प्रवाह द्वारा इसके निपटान की यह विधि अल्पविकसित देशों में सबसे आम है लेकिन यह अर्ध विकसित देशों जैसे चीन, भारत और इरान में भी प्रचलित है।

मल, कीचड, गन्दगी और विषाक्त प्रदूषक, सब पानी में फ़ेंक दिए जाते हैं। मल उपचार के बावजूद समस्याएं खड़ी होती हैं। जेव्नारित (??) मल कीचड में तब्दील होता है, जो समुद्र में बहा दिया जाता है कीचड के अतिरिक्त उद्योगों और सरकारों द्वारा रासायनों का रिसाव जल प्रदूषण का प्रमुख स्रोत हैं।

जल विवाद
जल के पीछे वास्तविक अन्तर राज्य संघर्ष का एक उदहारण है सुमेरिया के लगाश (Lagash) और उम्मा (Umma) राज्यों के बीच, 2500 और 2350 ईसा पूर्व हुआ संघर्ष। प्रमाण के आभाव में भी यह कहा जा सकता है की केवल जल के पीछे ही इतिहास में विभिन्न युद्ध लड़े गए हैं। जब पानी की कमी राजनीतिक तनाव का कारण बनता है, तो इसे जल तनाव कहा जाता है। जल तनाव अक्सर क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर संघर्ष का कारण रहा है।

जल तनाव संघर्ष और राजनीतिक तनाव को भी बढ़ावा दे सकते हैं चाहे वह पानी से सम्बंधित न भी हों। समय के साथ ताजे पानी की गुणवत्ता या मात्रा जनसंख्या की सेहत गिराते हुए आर्थिक विकास में अवरोधक भी हो सकती है और क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ा सकती है।

जल सम्बंधित संघर्ष और तनाव संभावित राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर भी है, विपत्तिकालीन नदी घाटी के निचले हिस्सों में चीन के दक्षिणी क्षेत्र उदाहरण के लिए पीली नदी या थाईलैंड में चाओ फ्राय नदी (Chao Phraya River) कई वर्षों से जल सम्बंधित तनाव से पीधित हैं इस के अतिरिक्त, चीन, भारत, ईरान और पाकिस्तान जैसे शुष्क देश जो भारी मात्रा में सिंचाई के लिए निर्भर हैं, वह विशेष रूप से जल सम्बंधित संघर्ष के जोखिम क्षेत्र में हैं राजनीतिक तनाव, नागरिक विरोध और हिंसा भी पानी के निजीकरण की प्रतिक्रिया हो सकते हैं 2000 के बोलीविया जल युद्ध (Bolivian Water Wars of 2000) संख्या 3 में वृत्त का अध्ययन हैं हम विभिन्न रूपों में जल का उपयोग करते हैं हम पानी का उपयोग तैराकी जैसे मनोरंजन के लिए करते हैं हम वस्तुएं धोने के लिए पानी का उपयोग करते हैं। पानी बिजली और सिंचाई के लिए प्रयोग किया जाता है। यह पौधों को सींचने के काम आता है ; सेचक भी जल की खपत करते हैं खेती बाधी और फसल बढ़ाने में जल का उपयोग होता है।

विश्व जल आपूर्ति और वितरण
पोषण और जल दो बुनियादी मानवीय आवश्यकताएं हैं हालांकि, 2002 से वैश्विक कवरेज के आंकड़े दर्शाते हैं कि, के हर दस लोगों में :

मोटे तौर पर 5 के घरों में पानी की आपूर्ति के लिए पाइप का कनेक्शन है (उन के निवास, प्लॉट या यार्ड में) 3 बेहतर जल आपूर्ति के अन्य माध्यम जैसे संरक्षित कुआँ या सार्वजनिक स्तान्द्पिपे का उपयोग करते हैं
2 सेवाहीन हैं. इसके अतिरिक्त, हर 10 में से 4 लोग सुधरी स्वच्छता के बिना रह रहे हैं। पृथ्वी शिखर सम्मेलन 2002 (Earth Summit 2002) में सरकारों ने कार्य कार्रवाई की एक योजना को मंजूरी दे दी.

सं 2015 तक सुरक्षित पानी पीने की असमर्थता रखने वालों का अनुपात लगभग आधा होने की संभावना है पानी के ‘मुनासिब अभिगमन’ को कम से कम 20 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन, एक किलोमीटर की दूरी के भीतर के स्रोत के तौर पर परिभाषित करती है
बुनियादी स्वच्छता की असमर्थता रखने वालों का अनुपात लगभग आधा होने की संभावना है GWSSR के मुताबिक “बुनियादी स्वच्छता” निजी या साझा लेकिन सार्वजनिक नहीं निपटान प्रणाली है जो मॉल को मानवीय संपर्क से अलग करती है।
2025 में जल वितरण का अनुमान
जैसे चित्र दर्शाता है, सं 2025 में पानी की कमी गरीब देशों में और प्रबल होगी जहाँ संसाधन सीमित हैं और जनसंख वृद्धि तेज़ है जैसे की मध्य पूर्व, अफ्रीका और कुछ भाग एशिया के। सं 2025 तक, बड़े शहर और उन के आस पास के क्षेत्रओं को सुरक्षित पानी और र्याप्त स्वच्छता प्रदान करने के लिए नए बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता होगी। यह कृषि जल उपयोगकर्ताओं, के साथ बढ़ते संघर्षों का सुझाव है, जो वर्त्तमान में मनुष्य द्वारा प्रयोग किए जाने वाले पानी के सबसे बड़े उपयोगकर्ता हैं।

सामान्यतः अधिक विकसित देश जैसे उत्तरी अमेरिका, यूरोप और रूस सन् 2025 तक पानी की आपूर्ति करने के लिए एक गंभीर खतरा नहीं देखेंगे, केवल इस लिए नहीं की उन की सापेक्ष धनराशि अधिक है, किंतु अधिक महत्वपूर्ण उन की जनसँख्या जल संसाधनों के साथ बेहतर समायोजित होगी। वहीं दूसरी ओर उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व, दक्षिण अफ़्रीका और उत्तरी चीन में भौतिक अभाव और जल सम्बंधित क्षमता, सापेक्ष जनसंख्या विस्फोट के कारण ये क्षेत्र गंभीर पानी की कमी का सामना करेंगे। दक्षिण अमेरिका, उप सहारा अफ्रीका, दक्षिणी चीन और भरत के अधिकतर भूभाग सन् 2025 तक पानी की आपूर्ति की कमी का सामना करेंगे। इन क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल में कमी के कारण होंगे विकास करने के लिए आर्थिक बाधाएं और अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि।

आर्थिक पहलू
जल आपूर्ति और स्वच्छता के लिए बुनियादी ढांचे में जैसे पाइप संजाल, जलोदंच केन्द्र और जल प्रशोधन केन्द्र पूंजी की एक बड़ी राशि के निवेश की आवश्यकता होती है। यह अनुमान है कि आर्थिक सह-संचालन और विकास संगठन (OECD) राष्ट्रों को पानी के समय आधारित बुनियादी ढांचे को बदलने के लिए, जल आपूर्ति की गारंटी देने के लिए, रिसाव दरों में कमी लाने और पानी की गुणवत्ता की रक्षा के लिए प्रति वर्ष कम से कम 200 अरब अमरीकी डॉलर का निवेश करना होगा।

अन्तान्र्राष्ट्रीय स्तर पर विकासशील देशों की आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है।सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (Millennium Development Goals) सं 2015 तक सुरक्षित पीने के पानी और बुनियादी स्वच्छता के आभाव में जी रहे जनसँख्या अनुपात को आधा करने का लक्ष्य पूरा करने के लिए 10 से 15 अरब अमरीके डॉलर के वर्त्तमान निवेश को दोगुना करने की आवश्यकता है इस में मौजूदा बुनियादी ढांचे के रखरखाव के लिए आवश्यक निवेश शामिल नहीं हैं.

एक बार बुनियादी सुविधाएं जगह पर हों तो प्रचलित जल आपूर्ति और स्वच्छता प्रणाली महत्वपूर्ण चलते खर्च अंतर्भूत करेगा। कार्मिकों, ऊर्जा, रसायन, रखरखाव और अन्य खर्चों की आपूर्ति के लिए इन पूंजी और परिचालन लागत को पूरा करने के लिए धन राशि की सूत्र उपयोगकर्ता फीस, सार्वजनिक धन या दो के कुछ संयोजन होंगे। पर यहीं पर जल अर्थशास्त्र जटिल होना शुरू हो जाता है क्योंकि यह सामाजिक और व्यापक आर्थिक नीतियों से टकराता है। ऐसे नैतिक प्रश्न जो पानी की उपलब्धता और पानी के उपयोग के बारे में आधारभूत जानकारी पर केंद्रित है इस लेख के दायरे से परे हैं। फिर भी यह समझने के लिए की जोखिमों और अवसरों के सन्दर्भ में जल मुद्दों का व्यापार और उद्योग पर क्या प्रभाव पढेगा, इस के लिए यह काफ़ी प्रासंगिक है।

व्यापार प्रतिक्रिया
स्थायी विकास विश्व व्यापार परिषद (World Business Council for Sustainable Development) अपने परिदृश्य निर्माण (scenario building) प्रक्रिया में कार्यरत है जिसके उद्देश्य हैं:

जल से सम्बंधित मूल मुद्दों और द्रिवेरों का व्यवसाय द्वारा समझ का स्पष्टीकरण करते हैं और बढ़ावा देना। व्यापार समुदाय और गैर जल प्रबंधन के मुद्दों पर व्यापार हितधारकों के बीच आपसी समझ को बढ़ावा देना।
निरंतर जल प्रबंधन के लिए समाधान के भाग के रूप में समर्थन प्रभावी व्यापार कार्रवाई। इके द्वारा किये गये अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि:
प्यासे समाज में व्यापार जीवित नहीं रह सकता।
जल संकट के लिए जल कारोबार में होने की आवश्यकता नहीं है।
व्यापार समाधान का हिस्सा है और इसकी क्षमता अपनी अभियान द्वारा संचालित है।
बढ़ते पानी के मुद्दे और जटिलता, लागत को बढ़ावा देंगे।

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