पवन ऊर्जा उत्पादन

विश्व भर में पवन ऊर्जा का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए होने लगा है। यह इस सरल अवधारणा पर आधारित है कि बहती हुई हवा टर्बाइन की पंखियों को घुमाती है और जेनरेटर में विद्युत पैदा होती है। पंखियाँ और जेनरेटर (नेसेल कहलाने वाले युनिट में) एक टावर के ऊपर लगे होते हैं।
प्रौद्योगिकी
पवन टर्बाइनों में प्राय: तीन रोटर पंखियाँ होती हैं, जो हवा के प्रवाह से घूमती हैं और एक जेनरेटर से सीधे-सीधे अथवा एक गियर बॉक्स के द्वारा जुड़ी रहती हैं। रोटर पंखियाँ जेनरेटर से जुड़े एक क्षैतिज केन्द्र से जुड़ी होती हैं जो नेसेल के अंदर स्थित रहता है। नेसेल में दूसरे विद्युतीय पुर्जे और पार्श्ववर्तन यंत्र भी लगे रहते हैं जो टर्बाइन को इस प्रकार घुमाते हैं कि यह हवा की ओर उन्मुख रहे। हवा की दिशा पर सेंसर द्वारा नजर रखी जाती है और टावर के शीर्ष को हवा की दिशा में लाया जाता है।
जेनरेटर द्वारा उत्पन्न विद्युत को हवा की गति बदलने पर स्वचालित रूप से नियंत्रित किया जाता है। रोटर का व्यास 30 मीटर से 90 मीटर के बीच हो सकता है जबकि उस टावर की ऊँचाई जिसपर पवन-ऊर्जा जेनरेटर लगे होते हैं, 25 मीटर से 80 मीटर तक हो सकती है।
पवन-टर्बाइन द्वारा उत्पन्न विद्युत को उचित प्रकार से अनुकूलित किया जाता है ताकि उसे स्थानीय ग्रिड में प्रवाहित किया जा सके। मौजूदा पवन-ऊर्जा जेनरेटरों की यूनिट क्षमता 225 किलोवाट से लेकर 2 मेगावाट तक होती है और उन्हें 2.5 मीटर/सेकेण्ड से लेकर 25 मीटर/सेकेण्ड की गति से बहने वाली हवा में परिचालित किया जा सकता है।
पवन चक्कियों की स्थापना
पवन-ऊर्जा जेनरेटरों की स्थापना हेतु उपयुक्त स्थल के चयन के लिए क्षेत्र विशेष में हवा की गति के आँकड़े 1-2 वर्षों तक एकत्र किये जाते हैं। इसके बाद, पवन-ऊर्जा जेनरेटरों को उनके स्थानों पर इस तरह लगाया जाता है कि उनके बीच की दूरी पर्याप्त हों ताकि वे एक-दूसरे को बाधित न करें। स्थान के चयन के बाद पवन चक्कियों की स्थापना में 2 से 3 महीने लग जाते हैं। एजेंसियों द्वारा उपकरणों की, ताकि वे निष्पादन के स्थापित मानदंडों पर खरे उतरें, जाँच की जाती है और उन्हें अभिप्रमाणित किया जाता है। स्थापना के बाद यंत्र का रख-रखाव संबंधित उत्पादनकर्ताओं द्वारा किया जाता है।
पवन-ऊर्जा परियोजना की लागत
पवन-ऊर्जा उत्पादन की लागत 4 से 5 करोड़ रुपये/मेगावाट आती है जो क्षेत्र विशेष पर निर्भर करती है। यंत्र का रख-रखाव 0.25 से 0.60 रुपये/किलोवाट-घंटा की दर से किया जा सकता है। परियोजना की पे-बैक अवधि 5 से 8 वर्ष आकलित की जाती है।

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